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भगवान बिरसा मुंडा के बलिदान दिवस पर सीएम मोहन यादव ने दी श्रद्धांजलि, जानिए कौन थे ‘धरती आबा’, क्यों कहा जाता है भगवान

Written by:Shruty Kushwaha
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आदिवासी चेतना, स्वाभिमान और अधिकारों के प्रतीक भगवान बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश शासन और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष का नेतृत्व किया। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता और सांस्कृतिक अस्मिता के लिए उनका योगदान आज भी प्रेरणास्रोत बना हुआ है।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जनजातीय गौरव और महान स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा के बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा को जनजातीय गौरव, महान स्वतंत्रता सेनानी और ‘धरती आबा’ के रूप में याद करते हुए उनके बलिदान और योगदान को राष्ट्र के लिए अमर बताया।

उन्होंने कहा कि “जनजातीय गौरव, महान स्वतंत्रता सेनानी, ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा जी के बलिदान दिवस पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। उन्होंने जल-जंगल-जमीन की रक्षा और राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। जनजातीय समाज की अस्मिता व संस्कृति के संरक्षण के लिए भी निरंतर संघर्षशील रहे। उनके योगदानों के प्रति यह राष्ट्र हमेशा कृतज्ञ रहेगा।”

भगवान बिरसा मुंडा का अतुलनीय योगदान

भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को वर्तमान झारखंड के खूंटी जिले के उलिहातू गांव में हुआ था। उन्हें आदिवासी समाज में “धरती आबा” अर्थात धरती का पिता कहा जाता है। वे ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन, जमींदारी प्रथा और बाहरी शोषण (दिकुओं) के खिलाफ आदिवासी समुदाय को संगठित करने वाले प्रमुख चेहरे बने। जनजातीय समुदाय उन्हें सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि समाज सुधारक, आध्यात्मिक नेता और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष के प्रतीक के रूप में भी मानता है। इसी कारण आदिवासी समाज में उन्हें भगवान का दर्जा प्राप्त है।

19वीं शताब्दी के अंत में उन्होंने ‘उलगुलान’ का नेतृत्व किया, जो आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के अधिकारों की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक संघर्ष था। इस विद्रोह में उन्होंने ब्रिटिश शासन और स्थानीय शोषकों के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध किया।

क्यों कहा जाता है भगवान

बिरसा मुंडा को ‘भगवान’ और ‘धरती आबा’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने न सिर्फ राजनीतिक और आर्थिक संघर्ष किया, बल्कि आदिवासी समाज में धार्मिक और सामाजिक सुधार भी लाए। उन्होंने ‘बिरसाइट’ नामक एक नया धार्मिक आंदोलन शुरू किया जो एकेश्वरवाद पर आधारित था। इसमें अंधविश्वासों, रूढ़िवादिता और बाहरी प्रभावों को दूर कर आदिवासी परंपराओं को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

आदिवासी समुदाय में वे पृथ्वी के पिता के रूप में पूजे जाते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक पहचान, भूमि अधिकारों और स्वशासन की रक्षा के लिए समर्पित कर दी। उनका प्रसिद्ध नारा “अबुआ राज सेतेर जना, महारानी राज टुंडू जना” (हमारा राज्य स्थापित हो, महारानी का राज्य समाप्त हो) आज भी आदिवासी गौरव और स्वाधीनता की भावना जगाता है।

आज भी हैं प्रेरणास्त्रोत

हर वर्ष 9 जून को भगवान बिरसा मुंडा का बलिदान दिवस मनाया जाता है। इसी दिन वर्ष 1900 में रांची जेल में उनका निधन हुआ था। उस समय उनकी आयु मात्र 25 वर्ष थी। ब्रिटिश सरकार ने दावा किया था कि उनकी मृत्यु हैजे के कारण हुई, लेकिन कई इतिहासकारों और आदिवासी समुदायों के बीच उनकी मौत को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। यही वजह है कि उनकी मृत्यु को आज भी रहस्यपूर्ण परिस्थितियों से जोड़कर देखा जाता है। भगवान बिरसा मुंडा का बलिदान दिवस सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह आदिवासी अधिकारों, सामाजिक न्याय और स्वाभिमान के लिए हुए संघर्ष को स्मरण करने का दिन भी माना जाता है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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