मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी निर्णय के अनुसार मध्यप्रदेश में भी राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के पूरे छह छंदों का सम्मानपूर्वक गायन किया जाएगा। इस निर्णय को तुरंत प्रभाव से लागू किया गया है।
इसकी जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लिए गए इस निर्णय से पूरा देश उन सभी अमर शहीदों का स्मरण करेगा जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार के निर्णय के अनुसार ‘वंदे मातरम’ के सभी छंद गाए जाएंगे।
मध्यप्रदेश में ‘जन गण मन’ से पहले गाया जाएगा ‘वंदे मातरम’
मध्यप्रदेश के सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और अन्य आधिकारिक आयोजनों में अब राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के पूरे छह छंदों का गायन या वादन राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले किया जाएगा। केंद्र सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री मोहन यादव ने घोषणा की है कि मध्यप्रदेश में यह नियम तुरंत लागू किया जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में एक आदेश जारी किया है जिसमें कहा गया है कि वंदे मातरम् के सभी 6 छंद (जिसकी कुल अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड है) को सरकारी समारोहों, कार्यक्रमों, स्कूल आयोजनों तथा अन्य औपचारिक कार्यक्रमों में ‘जन गण मन’ से पहले अनिवार्य रूप से गाया या बजाया जाएगा।
आदेश में कहा गया कि जब वंदे मातरम् और जन गण मन एक साथ कार्यक्रम में बजाए या गायन किए जायें तो वंदे मातरम को पहले प्रस्तुत किया जाएगा। गीत पूरा होने तक सभी उपस्थित व्यक्तियों को सम्मानसूचक स्थिति में खड़े रहना अनिवार्य होगा। यह नियम राष्ट्रीय ध्वज फहराने, राष्ट्रपति, राज्यपाल के आगमन या संबोधन से पहले और बाद, सिविल सम्मान समारोह, सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रमों व अन्य औपचारिक अवसरों पर लागू होगा।
जानिए राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ से जुड़ी खास बातें
भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे हो गए हैं। ‘वंदे मातरम्’ की रचना महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के पावन अवसर पर लिखा था। इसे पहली बार 1875 में साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित किया गया था। बाद में, 1882 में बंकिम चंद्र ने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया। इसे पहली बार राजनीतिक मंच पर रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था।
1905 में स्वदेशी आंदोलन के दौरान बंगाल विभाजन के विरोध में 7 अगस्त 1905 को यह पहली बार एक राजनीतिक नारे के रूप में उभरा। कलकत्ता टाउन हॉल में लगभग 40,000 लोगों ने मिलकर इसे गाया था। उस समय ब्रिटिश सरकार इस गीत के प्रभाव से इतनी डरी हुई थी कि उन्होंने इसके सार्वजनिक गायन पर प्रतिबंध लगा दिया था और गाने वालों को कारावास की सजा दी जाती थी। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में ‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे प्रभावशाली उद्घोष बन गया। वर्तमान में सरकारी प्रोटोकॉल के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ का आधिकारिक संस्करण छह छंदों का है, जिसकी कुल अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड मानी जाती है। इससे पूर्व सामान्यतः पहले दो छंदों का प्रयोग अधिक प्रचलित रहा है। डेढ़ सौ वर्ष पूरे करने जा रहा ‘वंदे मातरम्’ आज भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सांस्कृतिक आत्मसम्मान और राष्ट्रीय एकता की जीवंत स्मृति के रूप में देखा जाता है।





