बारिश का मौसम जहां कई लोगों के लिए राहत लेकर आता है, वहीं छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के कुछ गांवों के बच्चों के लिए यह डर और परेशानी लेकर आता है। यहां स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों को हर दिन तेज बहाव वाली नदी पार करनी पड़ती है।
सूरजपुर जिले के भैयाथान ब्लॉक के कारीमाटी और परसिया गांव की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को भी दिखाती है। कई सालों से पुल बनाने की मांग हो रही है, लेकिन अब तक निर्माण शुरू नहीं हो सका।
उफनती नदी पार कर स्कूल जाते हैं मासूम बच्चे
भैयाथान ब्लॉक के कारीमाटी और परसिया गांव से करीब 15 बच्चे रोज स्कूल जाते हैं। स्कूल पहुंचने के लिए उन्हें बीच में बहने वाली नदी पार करनी पड़ती है। गर्मी के दिनों में यह रास्ता आसान रहता है, लेकिन जैसे ही मानसून शुरू होता है, नदी का पानी तेजी से बढ़ जाता है।
तेज बहाव के बीच बच्चों का नदी पार करना किसी बड़े खतरे से कम नहीं होता। कई बार पानी इतना बढ़ जाता है कि बच्चों को वापस घर लौटना पड़ता है। ऐसे में उनकी पढ़ाई भी लगातार प्रभावित होती है।
बारिश के मौसम में बढ़ जाता है खतरा
मानसून के दौरान नदी का पानी कुछ ही घंटों में कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे समय में नदी पार करना बेहद मुश्किल हो जाता है। गांव के लोगों का कहना है कि हर साल यही स्थिति बनती है, लेकिन अब तक इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया।
स्कूल के शिक्षक भी मानते हैं कि बारिश के दिनों में बच्चों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता होती है। जब पानी ज्यादा बढ़ जाता है, तो बच्चों को स्कूल आने से मना करना पड़ता है। इससे कई दिन तक पढ़ाई रुक जाती है और बच्चों का नुकसान होता है।
दयाशंकर राजवाड़े बने बच्चों के लिए मसीहा
इस पूरे इलाके में अगर कोई सबसे बड़ी उम्मीद है, तो वह हैं स्थानीय ग्रामीण दयाशंकर राजवाड़े। वे कई सालों से अपनी जान की परवाह किए बिना बच्चों को अपनी पीठ पर बैठाकर नदी पार कराते हैं।
तेज बहाव, फिसलन और गहरे पानी के बीच बच्चों को सुरक्षित दूसरी तरफ पहुंचाना आसान काम नहीं है। फिर भी दयाशंकर हर दिन यह जिम्मेदारी निभाते हैं ताकि कोई बच्चा सिर्फ रास्ता न होने की वजह से पढ़ाई से दूर न हो जाए।
कई बार उठी पुल बनाने की मांग
गांव के लोगों ने ग्राम सभा में कई बार पुल बनाने की मांग रखी है। इस बारे में शिक्षा विभाग और प्रशासन को भी जानकारी दी गई है। लेकिन जमीन अधिग्रहण और अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल की कमी के कारण मामला आगे नहीं बढ़ पाया।
ग्रामीणों का कहना है कि हर साल बारिश आती है, बच्चे खतरा उठाते हैं, फिर भी काम शुरू नहीं होता। उनका सवाल है कि आखिर पुल बनने का इंतजार कब खत्म होगा।
पढ़ाई पर पड़ रहा सीधा असर
एक स्कूल साल में करीब 200 दिन खुलता है। इनमें से मानसून के कई दिनों तक बच्चे सुरक्षित तरीके से स्कूल नहीं पहुंच पाते। कई बार लगातार छुट्टी करनी पड़ती है।
इसका असर सिर्फ एक-दो दिन की पढ़ाई पर नहीं पड़ता, बल्कि पूरे साल की पढ़ाई कमजोर हो जाती है। छोटे बच्चों के लिए पढ़ाई की लय टूट जाती है और वे पीछे रह जाते हैं। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि शिक्षा तभी मजबूत होगी, जब बच्चों को सुरक्षित स्कूल पहुंचने की सुविधा मिले।






