डबरा, एक ऐसा शहर, जो कभी अपने गौरव, विकास और अनुशासन के लिए पहचाना जाता था। एक समय था जब यहां की शुगर फैक्ट्री पूरे देश में पहचान रखती थी। जब बड़े-बड़े महानगर भी 24 घंटे बिजली का सपना देखते थे, तब डबरा में निरंतर बिजली, साफ पानी और व्यवस्थित सड़कें हुआ करती थीं। सरकारी अस्पतालों में अनुभवी डॉक्टर तैनात रहते थे। प्रशासनिक अधिकारी कानून व्यवस्था को लेकर सजग और जवाबदेह दिखाई देते थे।
डबरा केवल एक तहसील नहीं था, बल्कि ऐसा शहर था जो भविष्य में जिले बनने की क्षमता रखता था। विकास, व्यापार और व्यवस्था के मामले में यह कई जिलों को चुनौती देता था।
लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि वर्ष 1990 के बाद यह शहर धीरे-धीरे अपनी पहचान खोने लगा?
आज तस्वीर बिल्कुल उलट चुकी है।
टूटी सड़कें, गंदगी से भरे ओवरफ्लो नाले, धूल, दूषित पानी, अतिक्रमण, भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी और प्रशासनिक लापरवाही, यही डबरा की नई पहचान बनती जा रही है।
नगर पालिका से लेकर तहसील और एसडीएम कार्यालय तक आमजन का भरोसा टूटता दिखाई देता है। जनसुनवाई अब समाधान का मंच कम और औपचारिकता अधिक लगने लगी है। किसान मंडी और कृषि विभाग के चक्कर काटते हैं, लेकिन राहत के बजाय शोषण महसूस करते हैं। आम आदमी अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के लिए भी सिस्टम के सामने बेबस नजर आता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भ्रष्टाचार के प्रमाण और शिकायतें संबंधित एजेंसियों तक पहुंच चुकी हैं, तब कार्रवाई क्यों नहीं होती? आखिर हर मामले में “जांच जारी है” और “तारीख पर तारीख” का सिलसिला कब तक चलता रहेगा?
क्या डबरा की यह स्थिति केवल राजनीतिक खींचतान का परिणाम है?
क्या राज्य में बीजेपी सरकार और डबरा में कांग्रेस विधायक होने का खामियाजा जनता भुगत रही है?
अगर ऐसा है, तो फिर वर्षों से नगर पालिका बीजेपी के पास होने के बावजूद विकास जमीन पर क्यों दिखाई नहीं देता?
अगर नहीं, तो फिर जवाबदेही तय क्यों नहीं होती?
डबरा की जनता अब केवल नाराज़ नहीं, बल्कि थकी हुई महसूस करती है। लोग बेहतर जीवन की तलाश में शहर छोड़ रहे हैं। परिवारों को अपने बच्चों के रिश्तों तक में दिक्कत आने लगी है, क्योंकि शहर की छवि लगातार खराब होती जा रही है।
अगर राज्य सरकार वास्तव में जमीनी हकीकत समझना चाहती है, तो वरिष्ठ अधिकारियों को बिना पहचान बताए आम नागरिक बनाकर डबरा के सरकारी कार्यालयों में भेजना चाहिए। तब शायद उन्हें समझ आएगा कि आमजन किस व्यवस्था से रोज गुजर रहा है, कहां अधिकारी अनुपस्थित मिलते हैं, कहां फाइलें धूल खाती हैं, और कहां जनता केवल इंतजार करती रह जाती है।
डबरा आज भी संभावनाओं से भरा शहर है। यहां की जनता मेहनती है, व्यापार की क्षमता है, भौगोलिक महत्व है और विकास की इच्छा भी। जरूरत केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति और ईमानदार प्रशासन की है।
यदि सरकार वास्तव में जनता का विश्वास जीतना चाहती है, तो डबरा को जिला बनाने की दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। कलेक्ट्रेट, एसपी कार्यालय और अन्य प्रमुख प्रशासनिक संस्थानों की स्थापना के साथ ईमानदार और जवाबदेह अधिकारियों की नियुक्ति की जाए।
डबरा की जनता केवल भाषण नहीं, बदलाव चाहती है।
वह अपने उसी पुराने शहर को वापस देखना चाहती है, जो कभी सपनों का शहर कहलाता था।
क्योंकि सच यही है।
डबरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन अगर हालात ऐसे ही रहे, तो एक जीवंत शहर धीरे-धीरे अपनी पहचान खो देगा।






