बॉलीवुड फिल्मों के पोस्टर्स पर हीरो के हाथ में सिगरेट थमाकर उसे ‘कूल’ और रफ-एंड-टफ दिखाना सालों पुराना फॉर्मूला रहा है। लेकिन अब इसी घिसे-पिटे स्टाइल को लेकर जाने-माने डायरेक्टर संजय गुप्ता ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने ‘एनिमल’, ‘धुरंधर’ और ‘लव एंड वॉर’ जैसी बड़ी फिल्मों के पोस्टर्स को शेयर करते हुए सीधा सवाल दागा कि जब पोस्टर्स में ही स्मोकिंग को इतना प्रमोट किया जाएगा, तो सिनेमाघरों में दिखाए जाने वाले नो-स्मोकिंग विज्ञापनों का आखिर क्या मतलब रह जाता है?

अपनी ही फिल्म ‘कांटे’ को लेकर घिरे संजय गुप्ता, ट्रोलर को दिया करारा जवाब

संजय गुप्ता का यह ट्वीट आते ही सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई और कई लोगों ने उल्टे उन्हीं को घेर लिया। यूजर्स ने साल 2002 में आई उनकी सुपरहिट फिल्म ‘कांटे’ की याद दिलाते हुए पूछा कि जब आपकी अपनी फिल्म में संजय दत्त सिगरेट पी रहे थे, तब यह ज्ञान कहां चला गया था? इस पर संजय गुप्ता ने भी पलटवार करने में देरी नहीं की और लिखा कि उस दौर में आज की तरह नो-स्मोकिंग वाले नियम और जागरुकता विज्ञापन लागू नहीं हुआ करते थे।

सिगरेट और मर्दानगी का पुराना रिश्ता, यूजर्स बोले- यह तो आइडिया की कमी है

इस बहस के बीच कई लोगों ने हिंदी सिनेमा की उस घिसी-पिटी सोच पर भी सवाल उठाए, जहां हीरो को दमदार दिखाने का सबसे आसान जरिया सिगरेट ही माना जाता है। यूजर्स का कहना है कि किसी मेल कैरेक्टर को ‘मर्दाना’ या भारी-भरकम लुक देने के लिए हाथ में सिगरेट पकड़ा देना दरअसल राइटर्स और डायरेक्टर्स की आलसी सोच को दिखाता है। सिनेमा का यह अंदाज़ पर्दे से निकलकर सीधे युवाओं की सोच पर असर डालता है।

हीरो का यह ‘खतरनाक स्वैग’ कितना सही? सोशल मीडिया पर छिड़ी नई बहस

असल में मामला सिर्फ तीन फिल्मों के पोस्टर्स तक सीमित नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि सिनेमा में किसी आदत को ग्लैमराइज करने की सीमा कहां खत्म होनी चाहिए। जब बड़े पर्दे पर स्टार्स इस तरह का स्वैग दिखाते हैं, तो फैंस जाने-अनजाने में उन्हें कॉपी करने लगते हैं और गलत आदतों की चपेट में आ जाते हैं। संजय गुप्ता के इस पोस्ट ने भले ही विवाद खड़ा किया हो, लेकिन इस पुराने फिल्मी ट्रेंड पर एक जरूरी बहस जरूर शुरू कर दी है।