दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि दिल्ली नगर निगम (MCD) द्वारा लग्जरी होटलों पर बढ़ाई गई प्रॉपर्टी टैक्स दर बिल्कुल सही और कानूनी रूप से तर्कसंगत है। अदालत ने कहा कि जिन लोगों के पास अधिक संपत्ति और आय है, उन्हें सार्वजनिक खजाने में भी ज्यादा योगदान देना चाहिए। कोर्ट ने यह भी माना कि लग्जरी होटल अपने आप उच्च श्रेणी की रेटिंग लेते हैं और अमीर ग्राहकों को टारगेट करते हैं, इसलिए इन पर अतिरिक्त टैक्स न्यायोचित है।
होटल मालिकों की याचिका खारिज
दरअसल, यह मामला कुछ फाइव स्टार होटलों की याचिकाओं से जुड़ा था। होटल मालिकों ने हाई कोर्ट में दावा किया था कि एमसीडी ने उनकी स्टार रेटिंग को घटाकर 4 स्टार कर दिया और उनके लिए यूज़र फैक्टर 10 तय कर दिया, जबकि पहले यह 8 था। साथ ही टैक्स दर भी 10% से बढ़ाकर 20% कर दी गई। होटल मालिकों ने इसे मनमाना बताते हुए एमसीडी के फैसले को चुनौती दी थी और अदालत से इसे रद्द करने की मांग की थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने उनकी इस दलील को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा– सुविधाएं ही बनाती हैं अलग
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि स्टार रेटिंग के आधार पर होटल अलग-अलग वर्गों में आते हैं और यह एक तार्किक प्रणाली है। फाइव स्टार और लग्जरी होटल प्रीमियम सेवाएं देते हैं, जिनमें बड़े बैंक्वेट हॉल, स्पा, फाइन डाइनिंग, कंसीयर्ज सेवाएं और अन्य शानदार सुविधाएं शामिल हैं। ये सुविधाएं उन्हें सामान्य होटलों से अलग बनाती हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि होटल खुद को प्रीमियम सेगमेंट में रखते हैं और धनी ग्राहकों को सेवा देते हैं, ऐसे में टैक्स दर बढ़ाना मनमाना नहीं है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी दिखता फर्क
मामले की सुनवाई करने वाले जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने कहा कि होटल वर्गीकरण प्रणाली को सरल रखना जरूरी है। अगर नई प्रणाली बनाई जाएगी तो प्रशासनिक काम बढ़ेगा और मामलों में अनावश्यक जटिलता आएगी। इसके अलावा डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे मेकमायट्रिप और गोइबिबो भी होटलों को उनकी स्टार रेटिंग के आधार पर दिखाते हैं, जिससे ग्राहकों को चयन करने में आसानी होती है। ऐसे में कोर्ट ने साफ कर दिया कि होटल मालिकों को अब बढ़े हुए प्रॉपर्टी टैक्स नियमों का पालन करना होगा।





