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कौन हैं डॉ. मेनका गुरुस्वामी? जो बनीं भारत की पहली LGBTQ+ सांसद, जानें इनके बारे में..

Written by:Gaurav Sharma
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भारतीय संसदीय इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा जब राज्यसभा में 19 सदस्यों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली। मशहूर संवैधानिक वकील डॉ. मेनका गुरुस्वामी इस शपथ ग्रहण समारोह का मुख्य आकर्षण रहीं, जिन्होंने पश्चिम बंगाल से टीएमसी सांसद के रूप में शपथ ली। गुरुस्वामी देश की पहली ऐसी सांसद हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी पहचान एक क्वीर (LGBTQ+) के रूप में साझा की है।
कौन हैं डॉ. मेनका गुरुस्वामी? जो बनीं भारत की पहली LGBTQ+ सांसद, जानें इनके बारे में..

आज भारतीय संसदीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन दर्ज हुआ। राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने सदन में नवनिर्वाचित और पुनर्निवार्चित 19 सदस्यों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस शपथ ग्रहण समारोह का सबसे खास चेहरा मशहूर संवैधानिक वकील डॉ. मेनका गुरुस्वामी रहीं। पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद के तौर पर शपथ लेने वाली गुरुस्वामी, देश की पहली ऐसी सांसद हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी पहचान एक क्वीर (LGBTQ+) के रूप में साझा की है। उनका संसद तक पहुंचना संवैधानिक मूल्यों की आवाज को और मजबूत करेगा।

कौन हैं डॉ. मेनका गुरुस्वामी?

51 वर्षीय डॉ. मेनका गुरुस्वामी का राज्यसभा में आना सामाजिक और राजनीतिक, दोनों ही स्तरों पर बेहद अहम माना जा रहा है। ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड जैसे दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षा प्राप्त गुरुस्वामी को साल 2018 की उस ऐतिहासिक कानूनी जीत के लिए जाना जाता है, जिसने देश के लाखों LGBTQ+ लोगों के जीवन में बदलाव ला दिया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में धारा 377 के खिलाफ एक लंबी और कठिन कानूनी लड़ाई लड़ी थी। इस लड़ाई का नतीजा था कि देश की सर्वोच्च अदालत ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, जिसे ब्रिटिश काल से चली आ रही एक दमनकारी धारा माना जाता था। यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समानता के अधिकार को मजबूत किया। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने अपनी दूरदर्शी रणनीति के तहत डॉ. गुरुस्वामी को उच्च सदन भेजा है। पार्टी का स्पष्ट उद्देश्य है कि गुरुस्वामी संसद में संवैधानिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों की आवाज को और अधिक सशक्त बनाएं, खासकर हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए। शपथ लेने के बाद डॉ. गुरुस्वामी ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने साफ कहा कि वह संविधान के समानता और भेदभाव रहित मूल्यों को पूरी दृढ़ता से आगे बढ़ाएंगी और सुनिश्चित करेंगी कि सभी नागरिकों को सम्मान और अधिकार मिलें।

डॉ. गुरुस्वामी का संसद में होना सिर्फ उनके लिए व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि पूरे LGBTQ+ समुदाय और भारतीय संवैधानिक लोकतंत्र के लिए एक गहरा प्रतीकात्मक महत्व रखता है। यह घटना दर्शाती है कि भारत का राजनीतिक परिदृश्य धीरे-धीरे अधिक समावेशी और विविध होता जा रहा है। एक ऐसे देश में जहां LGBTQ+ अधिकारों को लेकर समाज के एक बड़े हिस्से में अभी भी पूर्वाग्रह और गलतफहमी मौजूद हैं, वहां एक सार्वजनिक क्वीर व्यक्ति का संसद में बैठकर कानून बनाना, नीतियों पर बहस करना और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर अपनी बात रखना एक क्रांतिकारी कदम है। उनकी उपस्थिति संसद में लैंगिक और यौन अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर अधिक संवेदनशील, सूचित और न्यायसंगत चर्चाओं का मार्ग प्रशस्त करेगी। यह उन लाखों लोगों को उम्मीद और प्रेरणा देगी जो अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं और समाज में स्वीकृति, सम्मान तथा समानता की तलाश में हैं। यह भारतीय लोकतंत्र की बढ़ती परिपक्वता का भी प्रमाण है, जो विभिन्न पृष्ठभूमि और पहचान वाले लोगों को प्रतिनिधित्व का अवसर देता है।

इस महत्वपूर्ण समारोह के दौरान कुल 19 सदस्यों ने शपथ ली। इन सदस्यों में राजनीति के कई दिग्गज चेहरे शामिल थे, तो वहीं कुछ नए और युवा प्रतिनिधि भी थे। शपथ ग्रहण का यह अवसर भारतीय लोकतंत्र की विविधता को दर्शाता है, जहां अनुभवी नेता और पहली बार संसद पहुंचने वाले सदस्य एक साथ देश सेवा की शपथ लेते हैं। सभापति सीपी राधाकृष्णन ने एक-एक कर सभी सदस्यों को शपथ दिलाई। सभी सदस्यों ने भारतीय संविधान के प्रति अपनी निष्ठा और देश की संप्रभुता तथा अखंडता को बनाए रखने का संकल्प लिया।

इन 19 सदस्यों ने ली शपथ

शपथ लेने वाले इन 19 सदस्यों में रामदास बंधु आठवले, माया चिंतामन इवनाते, शरदचंद्र पवार जैसे अनुभवी राजनेता शामिल थे। इनके साथ ही रामराव सखाराम वडकुटे, डॉ. ज्योति नागनाथ वाघमारे, क्रिस्टोफर मणिकम, डॉ. अंबुमणि रामदास, कॉन्सटेंटाइन रवींद्रन, एल के सुधीश, डॉ. एम थंबीदुरई और तिरुचि शिवा ने भी शपथ ली। नए चेहरों में बाबुल सुप्रियो, डॉ. मेनका गुरुस्वामी, राजीव कुमार, रुक्मिणी मलिक (कोयल मलिक), बिस्वजीत सिन्हा, संतृप्त मिश्रा, दिलीप कुमार रे और मनमोहन सामल प्रमुख थे। इन सभी ने राज्यसभा सदस्य के रूप में अपनी नई पारी की शुरुआत की।

शपथ ग्रहण समारोह में ‘विविधता में एकता’ की दिखी झलक

आज के शपथ ग्रहण समारोह में भारत की ‘विविधता में एकता’ की स्पष्ट झलक देखने को मिली। शपथ लेने वाले 19 सदस्यों में से 6 सदस्यों ने तमिल भाषा में शपथ ली, जो दक्षिण भारत की समृद्ध भाषाई विरासत को दर्शाती है। इसके अलावा, 4 सदस्यों ने बंगाली में, 3 सदस्यों ने मराठी में और 3 सदस्यों ने ओडिया में अपनी शपथ पूरी की। 2 सदस्यों ने हिंदी में और 1 सदस्य ने अंग्रेजी में शपथ ली, जो देश की भाषाई विविधता का एक शानदार उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस बार राज्यसभा में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की बात करें तो तमिलनाडु से 6 सदस्य चुनकर आए हैं, महाराष्ट्र से 5, पश्चिम बंगाल से भी 5 और ओडिशा से 3 सदस्य उच्च सदन पहुंचे हैं। यह क्षेत्रीय संतुलन और विभिन्न राज्यों की आवाज को संसद में लाने का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

इस अवसर पर कई महत्वपूर्ण हस्तियां मौजूद थीं। संसदीय कार्य और अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू, जनजातीय कार्य मंत्री जुअल ओराम जैसे केंद्रीय मंत्री समारोह में उपस्थित रहे। इनके अलावा, राज्यसभा के महासचिव पीसी मोदी और सचिवालय के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी इस गौरवपूर्ण पल के साक्षी बने। उनकी उपस्थिति ने समारोह की गरिमा को और बढ़ा दिया। यह दिन भारतीय लोकतंत्र के समावेशी चरित्र और संसद की बदलती तस्वीर का गवाह बना।

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