मध्यप्रदेश के नीमच जिले के जावद विकासखंड स्थित प्राथमिक विद्यालय विजियातलाई में उस समय हर किसी की आंखें नम हो गईं जब 28 साल तक बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक बाबूलाल तुरंगरिया सेवानिवृत्त हुए। दरअसल विदाई के दौरान छात्र-छात्राएं अपने गुरुजी से लिपटकर रो पड़े और उन्हें जाने से रोकने लगे। वहीं अब यह भावुक दृश्य अब लोगों के दिलों को छू रहा है।
दरअसल बाबूलाल तुरंगरिया ने 1 अप्रैल 1998 को प्राथमिक विद्यालय विजियातलाई में अपनी पहली नियुक्ति जॉइन की थी। खास बात यह रही कि उन्होंने अपने पूरे शैक्षणिक जीवन में किसी दूसरे स्कूल का रुख नहीं किया। करीब 28 साल 3 महीने तक लगातार इसी विद्यालय में सेवाएं देने के बाद 31 जुलाई 2026 को वे सेवानिवृत्त हुए। इतने लंबे समय तक एक ही स्कूल में रहने से उनका रिश्ता सिर्फ विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे गांव के साथ परिवार जैसा जुड़ गया। यही वजह रही कि उनकी विदाई किसी औपचारिक कार्यक्रम की बजाय पूरे गांव के लिए भावुक पल बन गई।
बच्चों ने छोड़ने से किया इनकार
वहीं विदाई समारोह खत्म होने के बाद जैसे ही बाबूलाल तुरंगरिया स्कूल परिसर से बाहर निकलने लगे, कई बच्चे दौड़कर उनके पास पहुंच गए। किसी ने उनका हाथ पकड़ लिया तो कोई उनके गले लगकर फूट-फूटकर रोने लगा। कई बच्चों ने भावुक होकर कहा, “सर, आपको घर नहीं जाने देंगे… आप हमें छोड़कर मत जाइए।” यह दृश्य देखकर वहां मौजूद शिक्षक, अभिभावक, ग्रामीण और पूर्व छात्र भी अपनी भावनाएं नहीं रोक सके। खुद बाबूलाल तुरंगरिया भी बच्चों को गले लगाते हुए भावुक हो गए। उन्होंने सभी विद्यार्थियों को मन लगाकर पढ़ाई करने, अच्छा इंसान बनने और जीवन में आगे बढ़ने का संदेश दिया। गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने हमेशा बच्चों को शिक्षा के साथ संस्कार भी दिए, इसलिए उनके प्रति छात्रों का यह लगाव स्वाभाविक है।
ऐसे बने सबके ‘गुरुजी’
दरअसल ग्रामीणों और विद्यालय के शिक्षकों के अनुसार बाबूलाल तुरंगरिया केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं रहे। आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों की पढ़ाई कभी पैसों की वजह से न रुके, इसके लिए वे कई बार अपनी जेब से किताबें, कॉपियां, पेन और दूसरी जरूरी सामग्री खरीदकर देते थे। जरूरत पड़ने पर अभिभावकों से भी मिलते और बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें प्रेरित करते थे। गांव में किसी परिवार पर संकट आता तो वे सबसे पहले मदद के लिए पहुंचते। यही कारण है कि उनकी पहचान सिर्फ एक सरकारी शिक्षक के रूप में नहीं, बल्कि समाज के मार्गदर्शक के रूप में बनी। विद्यालय में आयोजित सम्मान समारोह में उन्हें शॉल, श्रीफल, स्मृति चिन्ह और पुष्पहार भेंट कर सम्मानित किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि बाबूलाल तुरंगरिया भले ही सरकारी सेवा से रिटायर हो गए हों, लेकिन उनके पढ़ाए हुए संस्कार और शिक्षा आने वाली कई पीढ़ियों तक याद रखी जाएगी।






