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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती, जानें क्या है पूरा मामला

Written by:Ankita Chourdia
Last Updated:
इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को POCSO मामले में दी गई अग्रिम जमानत को अब सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती मिली है। मामले के शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी ने उच्च न्यायालय के 25 मार्च के आदेश के खिलाफ अपील दायर की है। उनका तर्क है कि आरोपों की गंभीरता और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका पर पर्याप्त विचार नहीं हुआ है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती, जानें क्या है पूरा मामला

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) मामले में मिली अग्रिम जमानत अब सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें दी गई अग्रिम जमानत के आदेश के खिलाफ यह अपील मामले के शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी ने दायर की है। शिकायतकर्ता ने उच्च न्यायालय के 25 मार्च के आदेश पर सवाल उठाए हैं, उनका मानना है कि आरोपों की गंभीरता पर पर्याप्त विचार नहीं हुआ है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को हाईकोर्ट ने दी थी अग्रिम जमानत

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने 25 मार्च के आदेश में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी को अग्रिम जमानत दी थी। न्यायालय ने जमानत देते समय इस बात पर खास जोर दिया था कि मामले की जांच किसी भी तरह के बाहरी प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रहनी चाहिए और निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़नी चाहिए। हालांकि, अब इस आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की गई है। शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी का स्पष्ट मत है कि उच्च न्यायालय ने स्वामी पर लगे आरोपों की गंभीरता पर पर्याप्त और उचित विचार नहीं किया है, जो इस तरह के संवेदनशील मामले में अनिवार्य है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गिरफ्तारी पर रोक

उच्च न्यायालय ने इस मामले में 27 फरवरी को सरस्वती की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। न्यायालय ने निर्देश दिया था कि नाबालिग बच्चों के कथित यौन उत्पीड़न से संबंधित मामले में अंतिम आदेश सुनाए जाने तक उन्हें हिरासत में नहीं लिया जाएगा। आवेदकों को जांच में सहयोग करने का भी निर्देश दिया गया था। यह पूरा मामला प्रयागराज के झूसी पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है, जो यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम अदालत के निर्देशों के बाद दर्ज की गई थी।

प्राथमिकी में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर कई बटुकों, यानी युवा शिष्यों, के कथित यौन शोषण का गंभीर आरोप लगाया गया है। यह आरोप बटुकों के भविष्य और सुरक्षा से जुड़ा है, जिससे इस मामले की संवेदनशीलता और बढ़ जाती है। शिकायतकर्ता ने उच्च न्यायालय के जमानत के फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की है, उनका तर्क है कि आरोपों की गंभीरता को अनदेखा किया गया है, जो न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है और बच्चों के हितों के लिए हानिकारक हो सकता है।

शिकायतकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखा अपना तर्क

याचिका में शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह तर्क रखा है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्वामी के खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता को समझने में पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाई। यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) जैसे कानूनों का मुख्य उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना और उन्हें सुरक्षित वातावरण प्रदान करना है। ऐसे में, जब कई बटुकों के कथित यौन शोषण जैसे गंभीर आरोप लगे हों, तो अग्रिम जमानत देने से पहले आरोपों की प्रकृति, उनके संभावित परिणामों और पीड़ितों पर इसके प्रभाव पर गहराई से विचार करना न्यायसंगत माना जाता है। शिकायतकर्ता का मानना है कि इस महत्वपूर्ण पहलू पर उच्च न्यायालय का पर्याप्त ध्यान नहीं गया, जिससे उसके फैसले की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगता है।

सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई अपील में शिकायतकर्ता की एक और प्रमुख चिंता यह है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मामले के गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। याचिका में साफ तौर पर यह आशंका व्यक्त की गई है कि एक प्रभावशाली व्यक्ति होने के नाते, स्वामी गवाहों को अपने पक्ष में करने या उन्हें बयान बदलने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो मामले की निष्पक्ष जांच बुरी तरह प्रभावित होगी और न्याय की प्रक्रिया बाधित हो जाएगी। विशेष रूप से बच्चों से जुड़े यौन अपराधों के मामलों में गवाहों की सुरक्षा और उनके निर्भीक बयान बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इस आशंका के कारण, शिकायतकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय से इस पहलू पर विशेष ध्यान देने और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है।

शिकायतकर्ता की सुप्रीम कोर्ट से मांग

सर्वोच्च न्यायालय से इस आशंका पर गंभीरता से विचार करने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता ने न्याय सुनिश्चित करने और यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि मामले की जांच बिना किसी दबाव या प्रभाव के पूरी हो। उनका मानना है कि यदि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बाहर रहते हैं, तो जांच की पारदर्शिता और अखंडता खतरे में पड़ सकती है। इस अपील के माध्यम से शिकायतकर्ता ने बच्चों के अधिकारों और न्याय की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की है, ताकि पीड़ितों को सही मायने में न्याय मिल सके।

अविमुक्तेश्वरानंद की गिरफ्तारी पर रोक के बाद मामले ने लिया नया मोड़

यह मामला अब एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ पर आ गया है, जहां इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अग्रिम जमानत के आदेश को देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था में चुनौती दी गई है। मामले की कालक्रम को देखें तो, उच्च न्यायालय ने 27 फरवरी को स्वामी की गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी, फिर 25 मार्च को उन्हें अग्रिम जमानत दे दी। अब, शिकायतकर्ता की अपील पर सर्वोच्च न्यायालय इस मामले की समीक्षा करेगा। सर्वोच्च न्यायालय को यह तय करना होगा कि क्या आरोपों की गंभीरता और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका को देखते हुए उच्च न्यायालय का फैसला सही था। यह निर्णय न केवल इस विशिष्ट मामले के लिए, बल्कि POCSO अधिनियम के तहत अग्रिम जमानत से संबंधित भविष्य के मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करेगा, जिससे बच्चों के खिलाफ अपराधों में न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में अगला कदम तय होगा।

Ankita Chourdia
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