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आपातकाल की बरसी पर सीएम डॉ. मोहन यादव ने लोकतंत्र प्रहरियों को किया नमन, लोकतंत्र की रक्षा के लिए समर्पित रहने का आह्वान किया

इमरजेंसी का दौर भारतीय राजनीति का ऐसा अध्याय है जिसने लोकतंत्र, संविधान और नागरिक स्वतंत्रताओं के सामने अभूतपूर्व चुनौतियां खड़ी कर दी थी। इस अवधि में मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाया गया, प्रेस की स्वतंत्रता सीमित हुई और कई नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए थे।
CM Dr. Mohan Yadav

देश में 25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल की बरसी पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने लोकतंत्र प्रहरियों को नमन करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला दिन बताया। उन्होंने कहा कि तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के अहंकार के कारण देश पर आपातकाल थोपा गया, जिसने संविधान की आत्मा और लोकतांत्रिक मूल्यों को गंभीर आघात पहुंचाया।

मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि आपातकाल की विभीषिका के विरुद्ध डटकर खड़े होने वाले लोकतंत्र के प्रहरियों का देश सदैव ऋणी रहेगा। उन्होंने नागरिकों से लोकतंत्र की रक्षा और राष्ट्रसेवा के लिए निरंतर समर्पित रहने का संकल्प लेने का आह्वान किया। बता दें कि केंद्र की बीजेपी सरकार ने साल 2024 में 25 जून को “संविधान हत्या दिवस” के रूप में मनाने की घोषणा की थी।

मुख्यमंत्री ने किया लोकतंत्र को मज़बूत बनाने का आह्वान

सीएम मोहन यादव ने आपातकाल की 51वीं बरसी पर भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय बताते हुए लोकतंत्र सेनानियों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा “इस विभीषिका के विरुद्ध डटकर खड़े होने वाले सभी लोकतंत्र योद्धाओं को मैं श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। आइए, हम संकल्प लें कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सदैव समर्पित होकर देश की सेवा करते रहेंगे।” मुख्यमंत्री ने कहा कि 25 जून 1975 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने संविधान की मूल भावना को कुचलते हुए देश पर आपातकाल लागू किया था। उन्होंने इसे लोकतंत्र की हत्या का काला अध्याय बताते हुए कहा कि उस दौर ने भारत के स्वाभिमान को आहत किया था। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नया भारत संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को सर्वोच्च मानते हुए आगे बढ़ रहा है तथा लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

आपातकाल: भारतीय राजनीति का विवादित अध्याय

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में इमरजेंसी घोषित की थी। इमरजेंसी 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक लागू रही। इस दौरान कई विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया था। प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई थी और कई नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए थे। देश में आपातकाल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत घोषित किया गया था। आपातकाल की घटनाएं आज भी लोकतंत्र के प्रति सतर्क रहने की सीख देती हैं। उस दौर की स्मृतियां हमें बताती है कि संविधान प्रदत्त अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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