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MP वन विभाग: लाखों के फर्जी बिल पर बर्खास्त डिप्टी रेंजर बहाल, भोपाल से आदेश निरस्त होने पर विवाद

Written by:Ankita Chourdia
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मध्य प्रदेश वन विभाग में भ्रष्टाचार के एक मामले में बड़ा मोड़ आया है। नर्मदापुरम में लाखों के फर्जी बिलों के आरोप में बर्खास्त एक डिप्टी रेंजर को भोपाल में बैठे एक वरिष्ठ अधिकारी ने बहाल कर दिया है। विस्तृत विभागीय जांच के बाद लिए गए इस फैसले को पलटने पर विभाग के भीतर ही गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
MP वन विभाग: लाखों के फर्जी बिल पर बर्खास्त डिप्टी रेंजर बहाल, भोपाल से आदेश निरस्त होने पर विवाद

भोपाल/नर्मदापुरम। मध्य प्रदेश वन विभाग में एक बार फिर वरिष्ठ अधिकारियों के फैसलों पर सवाल उठ रहे हैं। नर्मदापुरम वृत्त में शासकीय राशि के दुरुपयोग के आरोप में बर्खास्त किए गए एक डिप्टी रेंजर को अपीलीय अधिकारी द्वारा राहत दे दी गई है। इस फैसले ने विभाग के भीतर एक नई बहस छेड़ दी है कि आखिर एक विस्तृत जांच के बाद की गई कार्रवाई को किस आधार पर निरस्त किया गया।

यह पूरा मामला डिप्टी रेंजर हरगोविंद मिश्रा से जुड़ा है, जिन्हें 2019 के एक मामले में विभागीय जांच के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। अब अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (सतर्कता) द्वारा बर्खास्तगी के आदेश को रद्द किए जाने के बाद इसे भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाला कदम बताया जा रहा है।

क्या था पूरा मामला?

मामले की शुरुआत साल 2019 में हुई थी, जब वन विभाग की एक टीम महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धि और शिरडी के भ्रमण पर गई थी। इस दौरे के खर्चों में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। दस्तावेजों के मुताबिक, दौरे के दौरान कई ऐसे होटलों और संस्थाओं के नाम पर लाखों रुपये का भुगतान दिखाया गया, जो या तो अस्तित्व में ही नहीं थे या फिर उनकी प्रकृति अलग थी।

तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक (CCF) नर्मदापुरम, IFS अशोक कुमार ने इस मामले में एक विस्तृत विभागीय जांच कराई थी। जांच रिपोर्ट के आधार पर उन्होंने 30 जून 2025 को आदेश क्रमांक 62 जारी कर डिप्टी रेंजर हरगोविंद मिश्रा को सेवा से बर्खास्त कर दिया था।

जांच में सामने आए थे चौंकाने वाले तथ्य

जांच में सामने आए थे चौंकाने वाले तथ्य

विभागीय जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए थे, जिनके आधार पर बर्खास्तगी की कार्रवाई की गई थी।

फर्जी संस्थाओं को भुगतान: जांच में पाया गया कि रालेगण सिद्धि में ‘संत निवास पद्मावती’ नामक संस्था के नाम पर 97,500 रुपये का भुगतान किया गया, लेकिन जांच में ऐसी कोई संस्था ही नहीं मिली।

होटल के नाम पर हेरफेर: शिरडी स्थित ‘सिंहगढ़ होटल’ के नाम पर दो बार में 1,95,000 रुपये (97,500 + 97,500) का भुगतान दिखाया गया। जांच में यह होटल केवल एक चाय-नाश्ते का रेस्टोरेंट निकला, जहां रुकने की कोई व्यवस्था नहीं थी।

रिश्तेदार को फायदा: इटारसी की ‘मां जगदम्बे कैटरिंग सर्विस’ को 3.64 लाख रुपये का भुगतान किया गया। यह फर्म नगर पालिका या खाद्य विभाग में कहीं भी पंजीकृत नहीं थी। जांच में यह भी पता चला कि इसकी संचालक रंजिता तिवारी, आरोपी डिप्टी रेंजर हरगोविंद मिश्रा की पत्नी की सगी बहन हैं।

जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि भुगतान के लिए लगाए गए बिल कंप्यूटर से बनाए गए थे और प्रतिपूर्ति प्रमाणकों पर कर्मचारियों के हस्ताक्षर भी कथित तौर पर फर्जी थे।

अपील में पलट गया फैसला

बर्खास्तगी के आदेश के खिलाफ डिप्टी रेंजर हरगोविंद मिश्रा ने अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (सतर्कता/शिकायत), भोपाल के समक्ष अपील दायर की। इस अपील पर सुनवाई करते हुए APCCF ने 15 जनवरी 2026 को नर्मदापुरम CCF द्वारा पारित बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त कर दिया।

इस आदेश के बाद ही पूरा विवाद खड़ा हुआ है। विभागीय गलियारों में यह चर्चा तेज है कि इतने गंभीर और तथ्यात्मक जांच के निष्कर्षों को अपीलीय स्तर पर कैसे नजरअंदाज कर दिया गया।

पूर्व अधिकारी ने की शिकायत

इस मामले को उजागर करने वाले पूर्व वन अधिकारी मधुकर चतुर्वेदी ने APCCF (सतर्कता) के इस फैसले को अन्यायपूर्ण बताया है। उन्होंने इसे सीधे तौर पर ‘आर्थिक भ्रष्टाचार को संरक्षण’ देने वाला कदम करार दिया है। चतुर्वेदी ने इस संबंध में वन बल प्रमुख (Head of Forest Force) को पत्र लिखकर पूरे मामले का पुन: परीक्षण कराने और हस्तक्षेप करने की मांग की है।

अब यह मामला विभाग के शीर्ष नेतृत्व के पाले में है। सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या इस ‘अद्भुत निर्णय’ की समीक्षा की जाएगी या फिर जांच रिपोर्ट को दरकिनार कर दिए जाने का यह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।