मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा नदी के संरक्षण के दावे प्रदेश सरकार करती है लेकिन इसकी हकीकत क्या है इसका एक ताजा उदाहरण सीहोर के एक पर्यावरण प्रेमी ने हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका में दिया है, नर्मदा जी के सीने को चीरकर लगातार निकाली जा रही रेत से आहत युवक ने जबलपुर हाई कोर्ट में दायर याचिका में प्रमाण सहित राज्य माइनिंग कारपोरेशन और सीहोर जिला प्रशासन के अधिकारियों पर अवैध रेत खनन को संरक्षण देने और सरकार को राजस्व का नुकसान पहुँचाने के आरोप लगाये हैं, हाई कोर्ट ने याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार, खनिज विभाग और सीहोर जिला प्रशासन के अधिकारियों को नीतिस जारी किये हैं।
मध्य प्रदेश की नदियों से रेत के अवैध उत्खनन के आरोप पिछले कई वर्षों से लगातार लग रहे हैं सरकारें बदल जाती हैं और इसी के साथ नेता एक दूसरे पर आरोप भी बदलने लगते हैं लेकिन नदियों से रेत का अवैध उत्खनन बंद नहीं होता, चंबल, सिंध, पार्वती, नर्मदा आदि नदियाँ प्रदेश के लोगों को जीवन देती हैं नर्मदा को तो मध्य प्रदेश की लाइफ लाइन कहा जाता है ये नदियाँ प्रदेश के पर्यावरणीय संतुलन को भी बनाये रखती हैं लेकिन पैसे के लालची लोगों का समूह नदियों को खोखला करने से नहीं हिचकिचाता, बड़ी बात ये है कि ये इसमें वे सरकारी अधिकारी भी शामिल होते हैं जिनपर नदियों के संरक्षण की जिम्मेदारी है।
नर्मदा में अवैध रेत उत्खनन, एमपी हाई कोर्ट में याचिका दायर
जिले की राजस्व अदालतों से लेकर हाई कोर्ट तक कई बार अवैध रेत उत्खनन की शिकायतें पहुंची , कोर्ट ने फटकार भी लगाई, सरकार ने कार्रवाई का भरोसा दिया लेकिन जमीन पर इस भरोसे को नहीं उतार इससे आहत एक पर्यावरण प्रेमी किसान ने नर्मदा में अवैध रेत उत्खनन का मामला एक बार फिर अदालत पहुंचाया है, सीहोर जिले के रहने वाले राजेश चौहान नामक व्यक्ति ने ये जनहित याचिका जबलपुर हाई कोर्ट में दाखिल की है।
खनिज अधिकारियों और सीहोर जिला प्रशासन अधिकारियों के खिलाफ याचिका
किसान राजेश चौहान ने हाई कोर्ट में राज्य माइनिंग कारपोरेशन भोपाल, जिला कलेक्टर सीहोर, जिला माइनिंग अधिकारी सीहोर, बुधनी एसडीएम, तहसीलदार के खिलाफ एक याचिका दायर की है जिसमें उन्होंने आरोप लगाये हैं कि इन सभी की मिलीभगत से लगातार नर्मदा नदी को खोखला किया जा रहा है, चौहान ने कहा रेत का अवैध उत्खनन कई वर्षों से जारी है जिसे रोकने के लिए उन्होंने कई बार प्रमाण सहित शिकायतें की लेकिन ठेकेदारों को सरकारी संरक्षण दिया जा रहा है वो नर्मदा में प्रतिबंध के बावजूद मशीनें चलाकर उसकी रेत निकल रहे हैं, अफसर कोई एक्शन नहीं लेते इसलिए वो अदालत गए हैं।
शासन को करोड़ों रुपये के नुकसान पहुँचाने का आरोप
राजेश चौहान ने कहा कि सरकारी अफसर और ठेकेदार मिलकर केवल नदी से रेत ही नहीं निकाल रहे, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी बिगाड़ रहे हैं साथ ही सरकार को राजस्व का भारी चूना भी लगा रहे हैं, उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि 2019 में सीहोर जिले का टेंडर 109 करोड़ रुपये का हुआ था लेकिन जब 2023 में फिर टेंडर हुआ तो केवल 76 करोड़ रुपये का हुआ, यानि 37 करोड़ कम का टेंडर हुआ चौहान ने बताया कि 2019 में रेत की कीमत 42 रुपये फीट थी और 2023 में ये 55 और 60 रुपये फीट बिकने लगी, इस तरह पहले सरकार को करोड़ों का राजस्व का नुकसान किया फिर महंगी रेत बेचकर जनता को ठगा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट तक लडूंगा लड़ाई: याचिकाकर्ता
उन्होंने कहा कि लगातार अवैध उत्खनन से ना सिर्फ भूजल प्रभावित हो रहा है बल्कि नदी का कटाव बढ़ रहा है नदी के आसपास बसे गांवों के लिए नुकसान हो रहा है, याचिका में राजेश चौहान ने अवैध उत्खनन पर तत्काल रोक लगाने और दोषी अधिकारियों पर कड़ा एक्शन लेने की मांग की, सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने स्टेट माइनिंग कारपोरेशन, जिल कलेक्टर सीहोर और एसडीएम बुदनी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है कि वे बताएं कि लगातार शिकायतों के बाद उनकी तरफ से क्या प्रयास किये गए और क्या कार्रवाई की गई, राजेश चौहान ने कहा कि मैं माँ नर्मदा के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहा हूँ, मुझे हाई कोर्ट पर भरोसा है लेकिन जरुरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लडूंगा, पीछे नहीं हटूंगा।
बहरहाल राजेश चौहान की याचिका सिर्फ सीहोर जिले का और केवल रेत खनन का नहीं मामला नहीं है बल्कि ये पूरे प्रदेश के पर्यावरण संरक्षण, सरकारी राजस्व, और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर कानूनी प्रश्न है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो यह मामला आर्थिक अपराध के साथ साथ पर्यावरण अपराध दोनों की श्रेणी में आ सकता है और दोषियों पर पर्यावरण संरक्षण कानून, खनिज एवं खनन अधिनियम, एनजीटी के आदेशों के तहत सजा सुनाई जा सकती है।


जितेंद्र यादव की रिपोर्ट





