हर सरकार का प्रयास होता है कि विकास की गति निरंतर बनी रहे। सड़क, पानी और सीवर जैसी बुनियादी सुविधाओं पर बड़ी राशि खर्च करने का उद्देश्य भी लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाना है। लेकिन जब यही विकास कार्य महीनों तक लोगों की परेशानी का कारण बन जाएं, तब सवाल योजना की मंशा पर नहीं, उसके क्रियान्वयन पर उठते हैं।
मध्य प्रदेश के कई शहरों में चल रहे सीवर प्रोजेक्ट इन दिनों ऐसे ही सवालों के घेरे में हैं। कहीं सड़कें खोदकर छोड़ दी गई हैं, कहीं काम की धीमी रफ्तार लोगों की मुश्किल बढ़ा रही है तो कहीं धूल, मिट्टी और कीचड़ के बीच रहना मजबूरी बन गया है। जिन सीवर लाइनों से शहरों को गंदगी से राहत मिलनी है, उनके निर्माण के दौरान पैदा हुई अव्यवस्था ही लोगों के लिए नई समस्या बनती दिखाई दे रही है।
जब केंद्रीय मंत्री भी उठा रहे हैं सवाल
सीवर प्रोजेक्ट के कामकाज पर सवाल अब केवल स्थानीय लोगों या मीडिया तक सीमित नहीं हैं। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी शिवपुरी के सीवर प्रोजेक्ट को लेकर नाराजगी जाहिर की है।
अपनी ही सरकार के सिस्टम में कमी दिखाई देने पर कोई मंत्री अपने क्षेत्र और वहां की जनता के पक्ष में खुलकर सवाल उठाता है तो यह जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी का ही हिस्सा है। लेकिन इसके बाद सरकार और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। जब शिकायतें लगातार सामने आ रही हों, बदहाल सड़कों के वीडियो सार्वजनिक हों और केंद्रीय मंत्री तक काम पर नाराजगी जता रहे हों, तब जिम्मेदार ठेकेदारों और अधिकारियों की जवाबदेही तय होती हुई भी दिखाई देनी चाहिए।
डबरा में ₹88 करोड़ का प्रोजेक्ट, गुणवत्ता पर पहले ही लग चुकी पेनल्टी
डबरा में करीब ₹88 करोड़ की लागत से चल रहा सीवर प्रोजेक्ट भी लंबे समय से सवालों के घेरे में है। काम की गुणवत्ता को लेकर ठेकेदार पर ₹20 लाख से ज्यादा की पेनल्टी लगाए जाने की बात सामने आ चुकी है। इसके बावजूद शहर में काम करने के तरीके को लेकर शिकायतें बनी हुई हैं।
कहीं खुदाई के बाद लंबे समय तक काम अधूरा पड़ा है, कहीं सड़क का ठीक से समतलीकरण नहीं हुआ तो कहीं काम के बाद सड़क को उसकी पुरानी स्थिति में नहीं लाया गया। जबकि सीवर लाइन बिछाने के बाद सड़क को निर्धारित मानकों के अनुसार ठीक करना भी प्रोजेक्ट का हिस्सा है।
ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि करोड़ों रुपये की परियोजना में केवल पाइपलाइन बिछा देना ही पर्याप्त कैसे माना जा सकता है, जब उसके बाद सड़क और आसपास की व्यवस्था को सामान्य स्थिति में लौटाना भी उसी कार्य का हिस्सा है?
इतने बड़े प्रोजेक्ट की तकनीकी निगरानी कौन कर रहा है?
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल निगरानी का भी है। नगर पालिका के पास इतने बड़े प्रोजेक्ट को तकनीकी स्तर पर देखने के लिए पर्याप्त इंजीनियरिंग व्यवस्था नहीं होने की बात सामने आती है। दूसरी तरफ ठेकेदार की अपनी तकनीकी टीम होने के बावजूद जमीन पर दिखाई देने वाली कमियां स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करती हैं।
किसी भी परियोजना की सफलता केवल उसकी लागत या कागजों पर दर्ज प्रगति से तय नहीं होती। उसकी असली कसौटी उस क्षेत्र की स्थिति है जहां काम किया जा रहा है। जिस सड़क से रोज बच्चों को स्कूल, मरीजों को अस्पताल और लोगों को अपने काम पर जाना है, उसे महीनों तक अव्यवस्थित छोड़ना किसी भी विकास परियोजना का सामान्य हिस्सा नहीं माना जा सकता।
7 इंच की पाइप सही है तो Survey Report सार्वजनिक करने में आपत्ति क्यों?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल घनी आबादी वाले क्षेत्रों में डाली जा रही 7 इंच की सीवर पाइप को लेकर है। लोगों की आपत्ति पर यह कहा जा रहा है कि पाइप का आकार बड़े संस्थानों की रिसर्च और तकनीकी मानकों के आधार पर तय किया गया है।
यदि ऐसा है तो इससे जुड़ी Survey Report और तकनीकी आधार जनता के सामने रखे जाने चाहिए।
सर्वे किस संस्था ने किया? कब किया गया? किन क्षेत्रों को इसमें शामिल किया गया? सर्वे के समय संबंधित क्षेत्रों की आबादी कितनी थी? भविष्य में आबादी बढ़ने का क्या अनुमान लगाया गया और सीवर पर पड़ने वाले संभावित दबाव का आकलन किस आधार पर हुआ?
इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आने से लोगों की आशंकाएं भी दूर होंगी। तकनीकी मानकों का हवाला देना अपनी जगह है, लेकिन ₹88 करोड़ की सार्वजनिक परियोजना में उन मानकों का आधार बताना पारदर्शिता का हिस्सा होना चाहिए।
पुराने अनुभव हैं, इसलिए भविष्य की चिंता भी जायज है
डबरा में पहले डाली गई पानी की पाइपलाइन के बार-बार फूटने को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे अनुभव के बाद यदि लोग नई सीवर लाइन की गुणवत्ता, क्षमता और भविष्य में उसके रखरखाव को लेकर सवाल पूछ रहे हैं तो उनकी चिंताओं का तकनीकी तथ्यों के साथ जवाब दिया जाना चाहिए।
यदि आने वाले वर्षों में सीवर लाइन बार-बार चोक होती है या पाइपलाइन में खराबी आती है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? निर्माण करने वाले ठेकेदार की, निगरानी करने वाली एजेंसी की या उस व्यवस्था की जिसने काम को स्वीकृति दी?
यह जिम्मेदारी अभी स्पष्ट होना इसलिए जरूरी है, क्योंकि निर्माण पूरा होने के बाद तकनीकी कमियों को सुधारना न केवल मुश्किल होगा, बल्कि जनता के पैसे पर अतिरिक्त बोझ भी डाल सकता है।
सवाल विकास का नहीं, विकास की गुणवत्ता का है
डबरा को सीवर सिस्टम की जरूरत है और शहर के भविष्य के लिए बेहतर सीवर नेटवर्क आवश्यक भी है। इसलिए सवाल परियोजना का विरोध करने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि ₹88 करोड़ खर्च होने के बाद शहर को ऐसी व्यवस्था मिले जो आने वाले वर्षों की जरूरतों को भी पूरा कर सके।
सरकार को Survey Report और परियोजना के तकनीकी आधार सार्वजनिक करने चाहिए। जहां लोगों को पाइप की क्षमता या डिजाइन को लेकर आशंका है, वहां विशेषज्ञों के जरिए स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। जरूरत महसूस हो तो भविष्य की आबादी और शहर के विस्तार को ध्यान में रखकर तकनीकी मानकों पर पुनर्विचार भी किया जा सकता है।
इसी तरह ठेकेदार या अधिकारियों के स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो कार्रवाई केवल पेनल्टी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उसका परिणाम काम की गुणवत्ता और जमीन पर सुधरी हुई स्थिति के रूप में दिखाई देना चाहिए।
विकास की वास्तविक कसौटी परियोजना की लागत नहीं, उसका परिणाम है। जनता के ₹88 करोड़ खर्च होने के बाद डबरा को केवल एक सीवर लाइन नहीं, बल्कि भरोसेमंद और लंबे समय तक काम करने वाला सीवर सिस्टम मिलना चाहिए। और जब पैसा जनता का है, परेशानी जनता झेल रही है तो उससे जुड़े सवालों का स्पष्ट जवाब मिलना भी उसका अधिकार है।






