देवास/बागली।सोमेश उपाध्याय।
टूटते-बिखरते परिवारों के इस दौर में 54 सदस्यों के संयुक्त परिवार की कल्पना करना किसी अजूबे से कम नहीं है।बागली का उपाध्याय परिवार उन्ही में से एक है।परंतु परिवार के कुछ सदस्य रोजगार की तलाश में इंदौर सहित अन्य जिलों में निवास करने लगे।परन्तु लाकडाउन के कारण पिछले 2 माह से पुरा परिवार वर्षो बाद एक साथ जुटा है।परिवार के सभी सदस्यों का भोजन एक ही चुल्हे पर बन रहा है!परिवार की तीन पीढ़ियों को साथ देख घर के बुजुर्ग की खुशी का ठिकाना नही है।उपाध्याय परिवार भी खुशी के छण को भूलना नही चाहता।इसलिए परिवार में रोज नए आयोजन किए जा रहे है।हाल ही में मडर्स डे के अवसर पूरे परिवार की महिलाओ का पूजन कर सम्मान भी किया गया था।यहां जब सब लोग शारीरिक दूरी बनाकर खाना खाते हैं तो सारा आंगन भर जाता है। परिवार में हंसी ठिठौली होती है, जब सब अपनी कहानियां किस्से सुनाते हैं। परिवारजन बताते हैं कि कोरोना महामारी में पूरा परिवार एकजुट है। एक दूसरे को इस मुश्किल घड़ी में साहस दे रहा है, तथा इस लाकडाउन ने रिश्तों को और भी करीब ला दिया है।
International Family Day: लॉकडाउन में सालों बाद एकजुट हुआ MP का ये परिवार
Written by:Gaurav Sharma
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पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है।
इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →






