आजादी के बाद भारत की रियासतें विलय हो गई लेकिन कुछ राजवंश ऐसे भी हैं जो आज भी सैकड़ों साल पुरानी अपनी परम्परा को पीढ़ी दर पीढ़ी निभा रहे हैं, इन्ही राजवंश में से एक है सिंधिया राजवंश, सिंधिया परिवार का मुखिया और अन्य सदस्य दशहरे के दिन ग्वालियर में होते हैं और राजशाही अंदाज में सुबह अपने कुल देवता की पूजा करते हैं कुल देवी की पूजा करते हैं और शाम को शमी के पेड़ का पूजन करते हैं, सिंधिया परिवार की इस परंपरा का ग्वालियरवासियों को भी इन्तजार रहता है।
सिंधिया परिवार की कुलदेवी मांढरे की माता की पहाड़ी के नीचे खुले मैदान पर सिंधिया परिवार की शाही परंपरा सदियों से निभाई जा रही है, करीब 300 साल पहले शुरू हुई इस परंपरा का निर्वहन आज सिंधिया परिवार की दसवी पीढ़ी उसी शिद्दत से कर रही है, परिवार के मुखिया “महाराज” ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आज बेटे “युवराज” महानआर्यमन सिंधिया के साथ शमी के पौधे का पूजन किया, उसके बाद उन्होंने जैसे ही अपनी तलवार से पत्तियों को छुआ जनता सोने (शमी के पौधे की पत्तियां) लूटने दौड़ पड़ी।
राजसी पोशाक में पिता- पुत्र, सिर पर थी शिंदेशाही पगड़ी
सिंधिया परिवार के प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया आज भी अपने परिवार की इस परंपरा को निभा रहे हैं और भविष्य के लिए अपने पुत्र महानआर्यमन को तैयार कर रहे हैं। सिंधिया ने आज गुरुवार 2 अक्टूबर 2025 को दशहरे के दिन शमी के पौधे का पूजन किया। राज पुरोहित ने मंत्रोच्चार के साथ शमी के पौधे का पूजन कराया, पूजन के दौरान शहनाई की मधुर धुन बजती रही, ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके पुत्र महाआर्यमन सिंधिया इस दौरान पारंपरिक राजसी पोशाक पहने थे और दोनों के सिर पर शिंदेशाही पगड़ी थी।
प्रदेश की जनता को सिंधिया ने दी दशहरे की शुभकामनायें
निर्धारित समय पर ज्योतिरादित्य सिंधिया दशहरा मैदान पहुंचे, उनके वहां पहुंचते ही वहां उनके स्वागत के लिए मौजूद उनकी रियासत के सरदारों और उनके वंशजों ने उनका रियासती अंदाज में कॉर्निश कर स्वागत किया। सिंधिया अभिवादन स्वीकार करते हुए चबूतरे पर पहुंचे और शाही परंपरा का निर्वहन, उन्होंने प्रधेशवासियों को दशहरे की शुभकामनायें दी। सिंधिया ने कहा मैं आप सभी को बधाई देता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि आपके जीवन में खुशहाली आये।






