हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने गुरुवार को अफसरशाही की सुस्ती और लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाते हुए शिक्षा सचिव, उच्च शिक्षा निदेशक, मंडी के उपनिदेशक और टिकरी सदवानी के वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य के चिकित्सा बिलों के भुगतान पर रोक लगा दी। अदालत ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि नौ साल से याचिकाकर्ता देव शर्मा के मेडिकल बिलों का भुगतान लंबित था और विभाग ने अदालत के पूर्व आदेशों की भी अवहेलना की। जस्टिस ज्योत्सना रिवाल दुआ ने स्पष्ट किया कि जब तक याचिकाकर्ता को भुगतान नहीं किया जाता, तब तक संबंधित अधिकारियों को किसी प्रकार का मेडिकल भुगतान न किया जाए। इस मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को होगी।
याचिकाकर्ता देव शर्मा ने वर्ष 2016 में 1,52,677 रुपये के मेडिकल रीइंबर्समेंट बिल जमा करवाए थे। इसके बावजूद न तो भुगतान हुआ और न ही विभाग ने ठोस कदम उठाए। 2022 में रिटायर होने के बाद भी उन्हें राशि नहीं मिली। अदालत ने 20 अगस्त को आदेश दिया था कि 10 दिन में भुगतान हो, जबकि 2 सितंबर की सुनवाई में सरकार ने पांच दिन का समय मांगा था। लेकिन 8 सितंबर को भी राशि जारी नहीं की गई। इस पर न्यायालय ने सख्ती दिखाते हुए अधिकारियों को सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराया और उनके मेडिकल बिलों के भुगतान पर रोक का आदेश दिया।
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हिमाचल हाईकोर्ट की सख्ती
इसी दौरान न्यायमूर्ति सत्येन वैद्य की अदालत ने राज्य सरकार को अनुबंध पर कार्यरत डॉक्टर अनुराधा ठाकुर की सेवाओं को नियमित करने का आदेश दिया। अदालत ने 19 दिसंबर 2017 के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमें सरकार ने नियमित करने से इनकार किया था। कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर की नियुक्ति स्वास्थ्य विभाग की चयन प्रक्रिया से हुई थी, इसलिए यह सरकारी सेवा का हिस्सा है। सिर्फ इसलिए कि उनका वेतन एनआरएचएम फंड से दिया जा रहा है, उन्हें सरकारी सेवा से अलग नहीं माना जा सकता। अदालत ने चार सप्ताह के भीतर 4 मई 2017 की नीति के अनुसार सेवाओं को नियमित करने के निर्देश दिए।
अदालत ने यह भी कहा कि डॉक्टर ठाकुर 13 साल से अधिक समय से सेवा दे रही हैं और उनकी नौकरी स्थायी प्रकृति की है। सरकार अस्थायी पदों का दुरुपयोग कर कर्मचारियों को अनिश्चितता की स्थिति में रख रही है। कोर्ट ने यह तर्क भी खारिज किया कि पद खाली नहीं हैं, क्योंकि सरकार ने स्वयं 50 नए डॉक्टरों की भर्ती का प्रस्ताव दिया था। डॉक्टर ठाकुर ने दावा किया कि उनके जैसे अन्य अनुबंध कर्मचारियों को पहले ही नियमित किया जा चुका है, जबकि उन्हें इस लाभ से वंचित रखा गया, जो भेदभावपूर्ण है।
इसके अलावा, जस्टिस राकेश कैंथला की अदालत ने जसबीर कौर बनाम हिमाचल प्रदेश मामले में एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि एफआईआर रद्द करने के लिए दूसरी याचिका केवल नए आधार पर ही दायर की जा सकती है। अदालत ने पाया कि आईपीसी की धारा 498ए, 504 और 506 के तहत दर्ज एफआईआर को लेकर याचिकाकर्ताओं और पीड़ित पक्ष के बीच पिछली याचिका खारिज होने के बाद 20 अगस्त को नया समझौता हुआ है, जो एक वैध आधार है। अदालत ने अगली सुनवाई 24 सितंबर तय की और दोनों पक्षों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया। इससे पहले 13 अगस्त को इसी मामले में दायर पहली याचिका खारिज कर दी गई थी।