हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा एक अप्रैल 2023 से पुरानी पेंशन स्कीम (ओपीएस) की बहाली पर भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने गहरी चिंता जताई है। उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने विधानसभा में वर्ष 2023-24 की कैग रिपोर्ट पेश की, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि राज्य की ऋण धारणीयता का आकलन करते समय ओपीएस से आने वाले वित्तीय बोझ को ध्यान में रखना जरूरी है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अप्रतिबद्ध व्यय के तहत सब्सिडी का बोझ 2019-20 के 1,067.78 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 1,768.35 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। बिजली सब्सिडी इसमें सबसे बड़ा हिस्सा रही, जो कुल उपदान का 53 प्रतिशत तक पहुंच गई।
हिमाचल में ओपीएस से बढ़ेगा वित्तीय बोझ
कैग ने यह भी उल्लेख किया कि ओपीएस से भविष्य में पड़ने वाले बोझ को निपटाने के लिए सरकार ने कोई अलग पेंशन निधि नहीं बनाई है। इसकी भरपाई राज्य के अपने संसाधनों और भारत सरकार व पीएफआरडीए के पास रखे अंश से की जाएगी। वहीं, वित्तीय अनुशासन पर सवाल उठाते हुए कैग ने कहा कि 31 मार्च 2023 तक 49.56 लाख रुपये से जुड़े गबन, हानि और चोरी के 30 मामलों में से सिर्फ 15 का निपटारा हुआ। अब भी 38.39 लाख रुपये से संबंधित 15 मामले लंबित हैं, जिनमें से कई 15 साल से अधिक पुराने हैं। इनमें 80 प्रतिशत मामले सरकारी सामग्री की हानि व दुरुपयोग से जुड़े थे।
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रिपोर्ट के अनुसार राज्य की प्राप्तियों और व्यय के बीच लगातार असंतुलन देखने को मिल रहा है। वर्ष 2019-20 से 2023-24 तक राजस्व प्राप्तियां 30,742.41 करोड़ से बढ़कर 39,173.04 करोड़ हुईं, लेकिन व्यय इससे कहीं अधिक तेजी से बढ़ा। राजस्व व्यय 30,730.43 करोड़ से बढ़कर 44,731.63 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यानी व्यय की औसत वार्षिक वृद्धि दर 8.97 प्रतिशत रही, जबकि प्राप्तियों की वृद्धि केवल 4.92 प्रतिशत रही। यही वजह है कि वर्ष 2022-23 में 6,336 करोड़ और वर्ष 2023-24 में 5,558 करोड़ का राजस्व घाटा हुआ। इसी दौरान राजकोषीय घाटा भी क्रमशः 12,380 करोड़ और 11,266 करोड़ रुपये पर बना रहा।
इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि विभिन्न विभागों ने 2017-18 से 2022-23 के बीच 2,795.23 करोड़ रुपये की योजनाओं के उपयोगिता प्रमाणपत्र समय पर नहीं दिए। कुल 2,990 योजनाओं से जुड़े ये प्रमाणपत्र अब तक लंबित हैं। कैग ने टिप्पणी की है कि लगातार बढ़ती देनदारियों, ऋण चुकौती और राजस्व-व्यय में असंतुलन हिमाचल के वित्तीय ढांचे पर गहरा दबाव डाल रहा है। यह न केवल ऋण स्थिरीकरण की प्रक्रिया में बाधा है बल्कि आने वाले वर्षों में वित्तीय स्थिरता के लिए बड़ा खतरा भी बन सकता है।