अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अफगानिस्तान में NATO देशों की भूमिका पर टिप्पणी करके विवादों में घिर गए हैं। ब्रिटेन और डेनमार्क समेत कई सदस्य देशों की तीखी आलोचना और माफी की मांग के बाद ट्रंप ने अपने बयान से यू-टर्न ले लिया है। उन्होंने अब ब्रिटिश सैनिकों की बहादुरी की तारीफ करते हुए उन्हें ‘महान योद्धा’ बताया है।
यह पूरा विवाद ट्रंप के एक इंटरव्यू से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने कहा था कि 9/11 हमले के बाद अफगानिस्तान में NATO के सैनिक अग्रिम मोर्चे से ‘थोड़ा पीछे’ रहते थे। इस बयान पर यूरोपीय देशों में भारी नाराजगी देखी गई, जिसके बाद ट्रंप को अपना रुख बदलना पड़ा।
जब ट्रंप ने कसा था NATO पर तंज
इस सप्ताह की शुरुआत में Fox News को दिए एक इंटरव्यू में डोनाल्ड ट्रंप ने NATO सहयोगियों पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था, “वे कहते हैं कि उन्होंने अफगानिस्तान में सैनिक भेजे। और उन्होंने भेजे भी, लेकिन वे थोड़ा पीछे, फ्रंटलाइन से दूर ही रहे।” ट्रंप ने यह सवाल भी उठाया था कि अगर अमेरिका को कभी जरूरत पड़ी तो क्या NATO देश उसका साथ देंगे।
बयान पर मचा बवाल, ब्रिटेन ने दी तीखी प्रतिक्रिया
ट्रंप की इस टिप्पणी के बाद ब्रिटेन की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के प्रवक्ता ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप ने 9/11 के बाद अफगानिस्तान में ब्रिटिश सेना सहित NATO सैनिकों की भूमिका को कम आंकने में गलती की है। हमें अपने सशस्त्र बलों पर गर्व है और उनकी सेवा और बलिदान को कभी नहीं भुलाया जाएगा।” स्टार्मर ने ट्रंप के बयान को ‘भयानक’ बताया था। वहीं, डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्शन ने भी ट्रंप से माफी की मांग की थी।
विरोध के बाद बदले सुर, Truth Social पर की तारीफ
चारों तरफ से हो रही आलोचना के बाद डोनाल्ड ट्रंप का रुख नरम पड़ गया। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर एक पोस्ट लिखकर ब्रिटिश सैनिकों की जमकर सराहना की।
“यूनाइटेड किंगडम के महान और बेहद बहादुर सैनिक हमेशा अमेरिका के साथ रहेंगे। अफगानिस्तान में 457 सैनिक शहीद हुए, कई गंभीर रूप से घायल हुए और वे अब तक के सबसे महान योद्धाओं में शामिल थे। यह रिश्ता इतना मजबूत है कि इसे कभी तोड़ा नहीं जा सकता है।” — डोनाल्ड ट्रंप
ट्रंप ने अपने पोस्ट में ब्रिटिश सेना को दुनिया की दूसरी सबसे बहादुर सेना बताते हुए लिखा, “हम आप सभी से प्यार करते हैं और हमेशा करते रहेंगे।” गौरतलब है कि 9/11 हमलों के बाद NATO के कलेक्टिव सिक्योरिटी क्लॉज के तहत 2001 से ही ब्रिटेन और अन्य सहयोगी देशों ने अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना का साथ दिया था, जिसमें ब्रिटेन के 457 सैनिक मारे गए थे।





