देश में बढ़ते साइबर ठगी के अपराध और पुलिस की उसमें संतोषजनक कार्रवाई ना होने पर हाई कोर्ट ने सख्ती दिखाई है। एक बुजुर्ग महिला की और से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने तीन राज्यों के डीजीपी को तलब किया है। हाई कोर्ट ने गृह मंत्रालय,आरबीआई और दूरसंचार विभाग को भी पक्षकार बनाने के निर्देश दिए है। मामले पर अगली सुनवाई 21 जुलाई 2026 को होगी।
जबलपुर के गोरा बाजार में रहने वाली बैंक से रिटायर्ड एक बुजुर्ग महिला चैताली मित्रा का कहना है कि 6.24 लाख रुपए की ठगी क्रेडिट कार्ड अपडेट करवाने के नाम पर हुई थी। उन्होंने कहा कि स्थानीय पुलिस थाने से लेकर एसपी स्तर तक के अधिकारियों को शिकायत दे चुकी हैं पर आज तक कार्रवाई नहीं हुई। परेशान होकर उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
जस्टिस हिमांशु जोशी की कोर्ट ने मामले पर सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की और कहा कि साइबर क्राइम की जांच में हर सेकेंड महत्वपूर्ण होता है. पुलिस अगर तेज नहीं चलेगी तो हर बार अपराधी बचकर निकल जाएगें, ऐसी स्थिति में विभागों की बीच रियल टाइम जांच तंत्र बनाना जरुरी है। कोर्ट ने पश्चिम बंगाल, झारखंड और असम के DGP तलब किया है।
जबलपुर पुलिस अधीक्षक संपत उपाध्याय, साइबर टीआई भूपेंद्र अरमो और जांच अधिकारी गोरा बाजार थाना प्रभारी संजीव कुमार त्रिपाठी कोर्ट में 29.06.2026 के आदेश के पालन में व्यक्तिगत रूप से उपास्थित हुए। कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक के साथ जांच की प्रगति और साइबर धोखाधड़ी के दोषियों का पता लगाने में आ रही दिक्कतों के बारे में चर्चा की। जबलपुर एसपी ने बताया कि शिकायतकर्ता से शिकायत मिलने के तुरंत बाद, मामले को ज़रूरी कार्रवाई के लिए साइबर सेल को भेज दिया गया था, बताया गया है कि साइबर धोखाधड़ी के मामलों में, साइबर सेल को अलग-अलग बैंकों की संबंधित नोडल एजेंसियों से जानकारी लेनी होती है।
दूसरे राज्य की पुलिस से सहायता मिलना आसान नहीं होता
एसपी ने बताया कि हर बैंक का अपना तय नोडल एजेंसी अलग-अलग जगहों पर मौजूद होने से ज़रूरी जानकारी जुटाने में काफ़ी समय लग जाता है। ऐसी नोडल एजेंसियों से शुरुआती जवाब मिलने में ही आम तौर पर तीन से पाँच दिन लग जाते हैं। पुलिस अधीक्षक ने यह भी बताया है कि कई मामलों में, जाँच के लिए दूसरे राज्यों की पुलिस से भी मदद लेनी पड़ती है, जहाँ संदिग्ध लेन-देन हुए हों या आरोपी मौजूद हों। हालाँकि साफ़ तौर पर कहा नहीं गया है, लेकिन दी गई जानकारी से यह साफ़ है कि दूसरे राज्यों की पुलिस से समय पर सहयोग हमेशा नहीं मिल पाता, जिससे जाँच में और देरी होती है।
पुलिस ने कोर्ट की बताई अपराधी तक पहुंचने में आने वाली दिक्कतें
कोर्ट को बताया गया कि साइबर अपराधी अब ज़्यादातर मासूम लोगों के नाम पर खोले गए बैंक खातों के ज़रिए काम कर रहे हैं, और अपनी गतिविधियों को कोऑर्डिनेट करने के लिए टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं। असली अपराधियों की पहचान करने के लिए, जाँच एजेंसी को IP लॉग, सब्सक्राइबर की जानकारी और दूसरी तकनीकी जानकारी पाने के लिए संबंधित विभागों से संपर्क करना पड़ता है, जिसमें फिर से काफ़ी समय लगता है। नतीजतन, जब तक अलग-अलग स्टेकहोल्डर्स से ज़रूरी जानकारी मिलती है, तब तक आरोपी अक्सर अपनी जगह बदल लेते हैं, अपराध से मिली रकम को ठिकाने लगा देते हैं और इलेक्ट्रॉनिक निशान मिटा देते हैं, जिससे जाँच में रुकावट आती है।
जबलपुर एसपी ने बताया संदिग्ध की लोकेशन असम में
जबलपुर पुलिस अधीक्षक ने अदालत को जांच में हुई प्रगति के बारे में जानकारी दी और बताया है कि अब तक जांच के आधार पर, मुख्य संदिग्ध की मौजूदा लोकेशन का पता असम राज्य में चला है। इस जानकारी को देखते हुए, याचिकाकर्ता के वकील ने मौजूदा कार्यवाही में असम के पुलिस महानिदेशक को प्रतिवादी के तौर पर शामिल करने का अनुरोध किया, ताकि जांच के दौरान प्रभावी निपटारा और तालमेल हो सके। कोर्ट ने जिसके लिए मंज़ूरी दी।
पश्चिम बंगाल, झारखंड और असम के DGP को हाजिर होने के निर्देश
कोर्ट ने कहा कि याचिका की कापी और आदेश की एक प्रति भारत संघ का प्रतिनिधित्व करने वाले स्टैंडिंग काउंसिल और भारतीय रिजर्व बैंक का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील को भी देनी होगी, ताकि वे ज़रूरी निर्देश ले सकें और सुनवाई की अगली तारीख पर इस कोर्ट की मदद कर सकें। शामिल मुद्दों की प्रकृति और जांच में राज्यों के बीच प्रभावी तालमेल सुनिश्चित करने की ज़रूरत को देखते हुए, पश्चिम बंगाल, झारखंड और असम के पुलिस महानिदेशक (DGP) सुनवाई की अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से इस कोर्ट के सामने मौजूद रहेंगे। वे अपने-अपने विभागों द्वारा जांच के संबंध में की गई कार्रवाई की पूरी स्टेटस रिपोर्ट भी साथ लाएंगे। मामले को आगे की सुनवाई के लिए 21.07.2026 को सूचीबद्ध किया जाए।






