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पं. दीनदयाल पर बोले पूर्व कमिश्नर डॉ. भार्गव, कहा- ‘मिल बांटकर खाना संस्कृति, छीनकर खाना विकृति’

Written by:Banshika Sharma
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नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पूर्व कमिश्नर डॉ. अशोक कुमार भार्गव ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि उपाध्याय का एकात्म मानववाद आज की वैश्विक समस्याओं का समाधान है। इस अवसर पर उन्हें सम्मानित भी किया गया।
पं. दीनदयाल पर बोले पूर्व कमिश्नर डॉ. भार्गव, कहा- ‘मिल बांटकर खाना संस्कृति, छीनकर खाना विकृति’

नई दिल्ली: भारतीय संस्कृति के पुरोधा पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद का दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना पहले था। यह दर्शन समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान पर केंद्रित है और भौतिकतावाद के बजाय वैश्विक कल्याण की भारतीय परिकल्पना को सामने रखता है। यह विचार पूर्व संभागायुक्त डॉ. अशोक कुमार भार्गव ने विज्ञान भवन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में व्यक्त किए।

विश्व हिंदी परिषद और भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में ‘पं. दीनदयाल उपाध्याय: प्रकृति, संस्कृति और दर्शन’ विषय पर यह सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसमें डॉ. भार्गव ने विशिष्ट वक्ता के रूप में उपाध्याय के दर्शन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

एकात्म मानववाद की सरल व्याख्या

डॉ. भार्गव ने एकात्म मानववाद को समझाते हुए कहा कि यह दर्शन व्यक्ति और समाज के बीच संघर्ष की बजाय एकता को देखता है। उन्होंने कहा, “जैसे एक विशाल वटवृक्ष अपनी संपूर्णता के साथ एक सूक्ष्म बीज में समाया होता है, वैसे ही व्यक्ति और समाज एक-दूसरे से जुड़े हैं। यह दर्शन जीवन को टुकड़ों में नहीं, बल्कि समग्रता में देखता है।”

उन्होंने कहा कि उपाध्याय जी का चिंतन यूरोपीय मानववाद से अलग है, जो वर्ग संघर्ष और प्रतिस्पर्धा पर आधारित है। इसके विपरीत, एकात्म मानववाद भारतीय जीवन शैली के अनुरूप एक प्रगतिशील समाज की रचना का मार्ग दिखाता है।

“जब शासन या राजसत्ता का प्रमुख स्वयं चलकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है, तभी रामराज की परिकल्पना साकार होती है। कोई भी व्यवस्था मनुष्य के कुशल-क्षेम के बिना सफल नहीं हो सकती।” — डॉ. अशोक कुमार भार्गव

संस्कृति, प्रकृति और राजनीति पर विचार

डॉ. भार्गव ने भारतीय संस्कृति की विशेषताओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति समन्वय की संस्कृति है, जो प्रकृति का सम्मान करती है, जबकि पश्चिमी सभ्यता प्रकृति को जड़ मानकर उसके दोहन का समर्थन करती है।

उन्होंने सरल शब्दों में समझाया, “किसी से छीन कर खाना विकृति है, भूख लगना प्रकृति है और मिल बांटकर खाना ही संस्कृति है।”

राजनीति में शुचिता पर उपाध्याय के विचारों का उल्लेख करते हुए डॉ. भार्गव ने कहा कि वे सिद्धांत की बलि देकर मिलने वाली जीत को हार से भी बुरा मानते थे। उनके लिए राष्ट्रीयता का आधार केवल भारत भूमि नहीं, बल्कि ‘भारत माता’ थी, क्योंकि ‘माता’ शब्द हटा देने से यह केवल भूमि का एक टुकड़ा रह जाता है।

डॉ. भार्गव को किया गया सम्मानित

इस कार्यक्रम के दौरान, पं. दीनदयाल उपाध्याय पर उत्कृष्ट आलेख के लिए डॉ. अशोक कुमार भार्गव को सम्मानित भी किया गया। उन्हें इथियोपिया दूतावास के गेब्रु टेकले, विश्व हिंदी परिषद के महासचिव डॉ. विपिन कुमार और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. रामनारायण पटेल ने यह सम्मान प्रदान किया।

सम्मेलन में लद्दाख के उप राज्यपाल कविंद्र गुप्ता, पूर्व राज्यसभा सदस्य के.सी. त्यागी, राज्यसभा सांसद रेखा शर्मा, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्र समेत देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, शिक्षाविद् और अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, चीन, सूरीनाम जैसे देशों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए।

Banshika Sharma
लेखक के बारे में
मेरा नाम बंशिका शर्मा है। मैं एमपी ब्रेकिंग न्यूज़ में कंटेंट राइटर के तौर पर काम करती हूँ। मुझे समाज, राजनीति और आम लोगों से जुड़ी कहानियाँ लिखना पसंद है। कोशिश रहती है कि मेरी लिखी खबरें सरल भाषा में हों, ताकि हर पाठक उन्हें आसानी से समझ सके। View all posts by Banshika Sharma
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