मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने नशीले इंजेक्शन के अवैध कारोबार से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस की जांच पर तीखी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियों का ध्यान अक्सर “छोटी मछलियों” पर ही केंद्रित रहता है, जबकि “बड़ी मछलियां” उनके पेट भरती हैं। अदालत ने साफ संकेत दिए कि इस तरह की कार्रवाई से असली अपराधी बच निकलते हैं और कानून का डर खत्म हो जाता है।
मामला जबलपुर में हुए नशीले इंजेक्शन के अवैध व्यापार से जुड़ा है, जिसमें पुलिस ने रांझी निवासी मेडिकल स्टोर संचालक नीरज परियानी और आधारताल निवासी समीर गुप्ता को गिरफ्तार किया था। 28 और 29 जुलाई 2023 को कोतवाली पुलिस ने नीरज परियानी के कब्जे से 26 पेटियों में रखे 52 हजार नशीले एम्पुल बरामद किए थे, जो समीर गुप्ता के मकान से मिले थे। पूछताछ के बाद दोनों को एनडीपीएस की विशेष अदालत में पेश किया गया।
विशेष अदालत की सजा पर रोक, हाईकोर्ट से जमानत
एनडीपीएस की विशेष अदालत ने 13 जनवरी 2025 को सुनवाई पूरी कर दोनों आरोपियों को 15-15 साल कैद और 2-2 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए नीरज परियानी ने हाईकोर्ट में अपील की।
जांच में खामियों पर नाराज हुआ कोर्ट
जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान पुलिस जांच में कई कमियां पाईं। कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने गहन और निष्पक्ष जांच करने के बजाय केवल सतही कार्रवाई की, जिससे यह मामला अधूरा रह गया।
सजा निलंबित, जमानत का लाभ
अदालत ने नीरज परियानी की सजा को निलंबित करते हुए उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि ऐसे मामलों में असली नेटवर्क तक पहुंचना जरूरी है, वरना अपराध की जड़ खत्म नहीं होगी।






