मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर पिछले कुछ दिनों से स्थिति चिंताजनक बनी हुई थी। प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत जूनियर डॉक्टरों ने अपनी लंबित मांगों को लेकर हड़ताल शुरू कर दी थी। इस हड़ताल का असर अस्पतालों की ओपीडी सेवाओं पर साफ दिखाई दे रहा था, जिससे मरीजों को इलाज के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था।
लेकिन अब मरीजों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। सरकार और जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन (जूडा) के बीच हुई बातचीत के बाद हड़ताल फिलहाल 16 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी गई है। इस फैसले के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं धीरे-धीरे सामान्य हो जाएंगी।
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सरकार और जूडा के बीच बैठक के बाद बनी सहमति
मध्य प्रदेश में जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल को लेकर सरकार ने तुरंत पहल की। जूडा प्रतिनिधिमंडल की उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल और स्वास्थ्य विभाग के आयुक्त के साथ बैठक हुई। इस बैठक में डॉक्टरों की मुख्य मांगों पर विस्तार से चर्चा की गई।
बैठक के दौरान सरकार की ओर से यह भरोसा दिलाया गया कि डॉक्टरों के लंबित स्टाइपेंड संशोधन और एरियर भुगतान के मामले में जल्द फैसला लिया जाएगा। सरकार के इस आश्वासन के बाद जूनियर डॉक्टरों ने फिलहाल अपना आंदोलन स्थगित करने का निर्णय लिया।
जूडा के प्रतिनिधियों ने बताया कि उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने उनकी मांगों को गंभीरता से सुना और सकारात्मक रुख दिखाया है। इसी वजह से संगठन ने आंदोलन को अस्थायी रूप से रोकने का फैसला किया।
5 से 7 दिनों में निर्णय की उम्मीद
बैठक के बाद जूडा प्रतिनिधिमंडल ने जानकारी दी कि सरकार ने भरोसा दिलाया है कि 5 से 7 दिनों के भीतर सभी लंबित मांगों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
डॉक्टरों का कहना है कि यदि इस अवधि में उनकी मांगों पर ठोस कदम उठाए जाते हैं तो स्थिति पूरी तरह सामान्य हो सकती है। लेकिन अगर निर्णय में देरी होती है तो आंदोलन फिर से शुरू किया जा सकता है। फिलहाल जूडा ने 16 मार्च तक आंदोलन को स्थगित कर दिया है, ताकि सरकार को निर्णय लेने का समय मिल सके।
हड़ताल का असर अस्पतालों में साफ दिखा
जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल का असर प्रदेश के कई सरकारी अस्पतालों में देखने को मिला। राजधानी भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज से जुड़े हमीदिया अस्पताल में स्थिति सबसे ज्यादा प्रभावित नजर आई।
हड़ताल के कारण ओपीडी सेवाएं बाधित हो गई थीं। सुबह से ही अस्पताल में मरीजों की लंबी कतारें लगी रहीं। कई मरीज इलाज के इंतजार में घंटों बैठे रहे, लेकिन डॉक्टरों की अनुपस्थिति के कारण उनका इलाज नहीं हो सका। कुछ मरीजों को बिना इलाज के ही वापस लौटना पड़ा। इससे मरीजों और उनके परिजनों में काफी नाराजगी देखने को मिली।
सिर्फ गंभीर मरीजों का इलाज जारी रहा
हालांकि हड़ताल के दौरान जूनियर डॉक्टरों ने पूरी तरह काम बंद नहीं किया था। जूडा ने पहले ही साफ कर दिया था कि आपातकालीन सेवाएं प्रभावित नहीं होने दी जाएंगी।
इस दौरान ऑपरेशन थिएटर में केवल गंभीर मरीजों का इलाज किया जा रहा था। वहीं सामान्य ऑपरेशन और पहले से तय सर्जरी को फिलहाल टाल दिया गया था। डॉक्टरों के अनुसार हर्निया, रॉड इंप्लांट और अन्य नियमित सर्जरी को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया था। इसका मकसद यह था कि गंभीर मरीजों की जान को किसी तरह का खतरा न हो।
आखिर क्यों शुरू हुई थी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल
मध्य प्रदेश में जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल का मुख्य कारण स्टाइपेंड संशोधन और एरियर भुगतान से जुड़ा हुआ है। जूडा एसोसिएशन के मुताबिक, प्रदेश सरकार के आदेश के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर जूनियर डॉक्टरों के स्टाइपेंड में संशोधन 1 अप्रैल 2025 से लागू होना था। लेकिन अब तक इस आदेश को लागू नहीं किया गया। इसके साथ ही अप्रैल 2025 से मिलने वाला एरियर भी जारी नहीं किया गया। डॉक्टरों का कहना है कि उन्होंने कई बार इस मुद्दे को शासन के सामने उठाया, लेकिन कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया। इसी वजह से उन्हें हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ा।
जूडा ने पहले भी दी थी चेतावनी
जूडा एसोसिएशन ने हड़ताल से पहले कई बार सरकार को चेतावनी दी थी। संगठन के पदाधिकारियों ने प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों के डीन और विभागाध्यक्षों को ज्ञापन सौंपा था।
इस ज्ञापन में साफ कहा गया था कि यदि स्टाइपेंड संशोधन और एरियर भुगतान का निर्णय जल्द नहीं लिया गया तो जूनियर डॉक्टर ओपीडी और अन्य सामान्य सेवाओं का बहिष्कार करेंगे। जब लंबे समय तक कोई निर्णय नहीं हुआ, तब सोमवार से डॉक्टरों ने हड़ताल शुरू कर दी थी।
स्वास्थ्य सेवाओं में जूनियर डॉक्टरों की अहम भूमिका
सरकारी मेडिकल कॉलेजों और उनसे जुड़े अस्पतालों में जूनियर डॉक्टरों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। अस्पतालों में मरीजों की जांच, इलाज और निगरानी का बड़ा हिस्सा इन्हीं डॉक्टरों के जिम्मे होता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी अस्पतालों में करीब 60 से 70 प्रतिशत काम जूनियर डॉक्टरों के भरोसे चलता है। ऐसे में उनके हड़ताल पर जाने से स्वास्थ्य सेवाओं पर सीधा असर पड़ता है।
मरीजों को क्यों हुई सबसे ज्यादा परेशानी
जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल का सबसे ज्यादा असर आम मरीजों पर पड़ा। सरकारी अस्पतालों में रोजाना हजारों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। जब ओपीडी सेवाएं बंद हुईं तो मरीजों को डॉक्टरों से मिलने में परेशानी होने लगी। कई मरीजों को निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ा, जिससे उनका खर्च भी बढ़ गया।
ग्रामीण इलाकों से आने वाले मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ी क्योंकि वे खासतौर पर सरकारी अस्पतालों में सस्ते इलाज के लिए आते हैं।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
मध्य प्रदेश सरकार के लिए जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई। स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारु बनाए रखना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। अगर हड़ताल लंबी चलती तो अस्पतालों में गंभीर स्थिति पैदा हो सकती थी। इसी वजह से सरकार ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए जूडा प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक की और समाधान का रास्ता निकाला।