मध्य प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण का मामला एक बार फिर हाईकोर्ट में पहुंच गया है। आज होने वाली सुनवाई को इस केस के लिए काफी अहम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि अब यह मामला अंतिम सुनवाई की ओर बढ़ रहा है। पिछली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भी कहा था कि इतने लंबे समय से लंबित इस विवाद का जल्द समाधान किया जाना चाहिए। ऐसे में सरकारी कर्मचारी और अलग-अलग कर्मचारी संगठन आज की सुनवाई पर नजर बनाए हुए हैं।
आज राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह कोर्ट में जवाब पेश करेंगे। अदालत यह भी जानना चाहती है कि मामला विचाराधीन होने के बावजूद प्रदेश में जो प्रमोशन किए जा रहे हैं, उनका आधार क्या है। इसी मुद्दे पर सरकार अपना स्पष्टीकरण देगी। माना जा रहा है कि सरकार के जवाब के बाद अदालत आगे की सुनवाई की दिशा तय कर सकती है।
पिछली सुनवाई में क्या हुआ था?
पिछली सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जान्हवी पंडित ने अदालत को बताया था कि इस महत्वपूर्ण मामले में महाधिवक्ता प्रशांत सिंह खुद सरकार का पक्ष रखना चाहते हैं। उनकी अनुपलब्धता के कारण कोर्ट से अतिरिक्त समय मांगा गया था, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया था। इसके बाद सरकार को अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का अवसर दिया गया।
सुनवाई के दौरान सपाक्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज शर्मा ने अदालत से जल्द फैसला देने की मांग की। उनका कहना था कि पिछली सुनवाई में सरकार की ओर से मौखिक रूप से यह भरोसा दिया गया था कि अंतिम निर्णय आने तक नई प्रमोशन नीति के तहत पदोन्नति नहीं की जाएगी।
वहीं दूसरी ओर अजाक्स की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर ने कहा कि कोर्ट के रिकॉर्ड में प्रमोशन पर रोक का कोई लिखित आदेश नहीं है, इसलिए केवल मौखिक आश्वासन के आधार पर प्रमोशन प्रक्रिया को नहीं रोका जा सकता। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था।
सरकारी कर्मचारियों पर क्या पड़ेगा असर?
प्रमोशन में आरक्षण का यह मामला प्रदेश के लाखों सरकारी कर्मचारियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कई विभागों में पदोन्नति की प्रक्रिया इस विवाद के कारण लंबे समय से प्रभावित रही है। हाल ही में विधानसभा सचिवालय में जारी 15 पदोन्नति आदेशों पर भी सपाक्स ने आपत्ति दर्ज कराई थी। संस्था का कहना है कि जब मामला अदालत में विचाराधीन है, तब तक किसी भी विभाग में नई पदोन्नति नहीं होनी चाहिए।
दूसरी तरफ सरकार और कुछ कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि प्रशासनिक कामकाज प्रभावित न हो, इसलिए नियमों के अनुसार प्रमोशन की प्रक्रिया जारी रह सकती है। अब हाईकोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार की ओर से पहले दिए गए मौखिक आश्वासन की स्थिति क्या है और वर्तमान में जारी प्रमोशन किस आधार पर किए जा रहे हैं।
एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया की डिवीजन बेंच पहले ही कह चुकी है कि यह मामला काफी समय से लंबित है और अब इसका जल्द अंतिम निराकरण किया जाएगा। ऐसे में आज की सुनवाई को इस पूरे विवाद का अहम पड़ाव माना जा रहा है। यदि कोर्ट आगे अंतिम सुनवाई की तारीख तय करता है या कोई महत्वपूर्ण निर्देश जारी करता है, तो उसका असर प्रदेश की प्रमोशन नीति और हजारों कर्मचारियों के भविष्य पर पड़ सकता है।






