शिवसेना (यूबीटी) नेता और पूर्व सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने महिला आरक्षण बिल को लेकर देश की राजनीति में तेज हुई बहस के बीच अपनी राय रखी है। उन्होंने इस बिल का स्वागत तो किया है, लेकिन साथ ही यह भी साफ कर दिया कि पहले पारित इस बिल में कुछ गंभीर कमियां थीं, जिसके चलते इसे लागू करने में 2029 तक की देरी हो सकती है। चतुर्वेदी ने जोर देकर कहा कि सरकार और विपक्ष दोनों की यह जिम्मेदारी है कि वे महिलाओं से किया गया वादा निभाएं और इस महत्वपूर्ण बिल को जल्द से जल्द प्रभावी करें।
प्रियंका चतुर्वेदी ने मीडिया से बातचीत में इस मुद्दे की गहराई से पड़ताल की। उन्होंने बताया कि 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जो महिला आरक्षण बिल संसद में पारित हुआ था, उसमें यह प्रावधान रखा गया था कि महिलाओं को आरक्षण 2029 तक ही मिल पाएगा। चतुर्वेदी ने उस समय भी इस प्रावधान पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका दृढ़ता से मानना था कि यह बिल तुरंत प्रभाव से लागू होना चाहिए था और मौजूदा सीटों पर ही महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए था, ताकि महिला सशक्तिकरण की दिशा में तत्काल कदम उठाए जा सकें।
अब जब मौजूदा सरकार इस बिल में संशोधन (अमेंडमेंट) लाने की बात कर रही है, तो प्रियंका चतुर्वेदी के अनुसार यह बात और पुख्ता हो जाती है कि पहले पारित बिल में वास्तव में खामियां थीं। उन्होंने कहा कि संशोधनों की बात से यह भी स्पष्ट होता है कि इस बिल को पूरी तरह से लागू करने में और देरी हो सकती है। यह देरी देश की आधी आबादी, यानी महिलाओं को उनके संवैधानिक अधिकारों से लंबे समय तक वंचित रखने जैसा होगा, जो किसी भी प्रगतिशील समाज के लिए चिंता का विषय है।
प्रियंका चतुर्वेदी ने महिलाओं से किए गए वादे की अहमियत पर दिया जोर
चतुर्वेदी ने इस बात पर खास जोर दिया कि महिलाओं से किया गया यह वादा निभाना सिर्फ सरकार की ही नहीं, बल्कि विपक्ष की भी सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने याद दिलाया कि लोकसभा में इस बिल को एआईएमआईएम (AIMIM) को छोड़कर लगभग सभी विपक्षी दलों ने सर्वसम्मति से समर्थन दिया था। ऐसे में, यदि इस महत्वपूर्ण वादे को पूरा नहीं किया जाता है, तो इसे पूरे देश की महिलाओं के साथ संसद की सामूहिक वादाखिलाफी माना जाएगा। यह राजनीतिक दलों के लिए एक गंभीर सवाल खड़ा करेगा कि वे महिला सशक्तिकरण के प्रति कितने गंभीर और प्रतिबद्ध हैं। महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सुनिश्चित करना एक मजबूत लोकतंत्र की नींव है।
उन्होंने साफ और स्पष्ट शब्दों में कहा कि महिलाओं को उनके अधिकारों से अब और अधिक समय तक वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उनकी मांग है कि यह बिल जल्द से जल्द लागू होना चाहिए, ताकि महिलाएं विधायिका में अपनी उचित भागीदारी पा सकें। प्रियंका चतुर्वेदी ने इस मुद्दे पर कुछ सांसदों द्वारा उठाई गई एक व्यावहारिक चिंता का भी जिक्र किया। कुछ सांसदों का कहना है कि यदि संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ती है, तो सदन में बोलने का समय सीमित हो जाएगा, जिससे सभी सदस्यों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाएगा। प्रियंका चतुर्वेदी ने इस बात से सहमति जताई और इसे एक वास्तविक और व्यावहारिक समस्या करार दिया।
इस समस्या का समाधान भी उन्होंने सुझाया। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि अगर किसी महत्वपूर्ण बिल पर चार घंटे की चर्चा हो और उसमें 800 सांसद शामिल हों, तो हर सांसद को अपनी बात रखने के लिए मुश्किल से कुछ मिनट ही मिल पाएंगे। ऐसे में, उन्होंने सुझाव दिया कि महिला आरक्षण बिल में आवश्यक संशोधनों के साथ-साथ संसद के कामकाज के घंटों (वर्किंग आवर) को भी बढ़ाया जाना चाहिए। उनका मानना है कि ऐसा करने से हर मुद्दे पर व्यापक और संतुलित चर्चा हो सकेगी और सभी सांसदों, विशेषकर नई महिला सांसदों को, सदन में अपनी बात रखने और जनता के मुद्दों को उठाने का पर्याप्त अवसर मिलेगा, जिससे संसदीय प्रक्रिया और भी समृद्ध होगी।
प्रियंका चतुर्वेदी ने विपक्ष के आरोपों पर दिया जवाब
वहीं, विपक्षी दलों द्वारा लगाए जा रहे इस आरोप पर कि भाजपा 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए इस बिल को ला रही है, प्रियंका चतुर्वेदी ने अपनी बेबाक राय रखी। उन्होंने कहा कि चुनाव का फैसला कोई एक पार्टी नहीं करती, बल्कि जनता करती है। उन्होंने आगे कहा कि यदि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलता है, तो इसका लाभ किसी एक पार्टी को नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों की महिला कार्यकर्ताओं को मिलेगा। इससे देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में महत्वपूर्ण वृद्धि होगी, जो लोकतंत्र के लिए एक बेहद शुभ संकेत है और देश के समग्र विकास में सहायक सिद्ध होगा। यह एक दीर्घकालिक सुधार है, जिसके फायदे सभी को मिलेंगे।
प्रियंका चतुर्वेदी ने पश्चिम एशिया के तनाव पर व्यक्त की चिंता
अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी प्रियंका चतुर्वेदी ने अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने पश्चिम एशिया में जारी मौजूदा तनाव पर गहरी चिंता जताई, जहां स्थिति लगातार नाजुक बनी हुई है। उन्होंने जानकारी दी कि भारत के विदेश मंत्री ने हाल ही में क्षेत्र के कई देशों के विदेश मंत्रियों से बातचीत की है और उम्मीद जताई कि इन कूटनीतिक प्रयासों से कोई सकारात्मक समाधान निकलेगा और तनाव कम होगा। भारत हमेशा से वैश्विक शांति का पक्षधर रहा है।
चतुर्वेदी ने कहा कि एक तरफ ईरान अपनी स्थिति पर कायम है तो दूसरी ओर अमेरिका भी अपने रुख पर अड़ा हुआ है, जिससे गतिरोध बना हुआ है। इस दौरान दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल की जा रही भाषा को उन्होंने विशेष रूप से आपत्तिजनक बताया। उन्होंने चेताया कि इस तरह की आक्रामक भाषा से स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो सकती है, जिससे वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। उन्होंने सभी पक्षों से संयम बरतने और संवाद के माध्यम से मुद्दों को सुलझाने का आग्रह किया।





