कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने मंगलवार को भारत में आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे पर गंभीर चिंता जताई। केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री एस पी सिंह बघेल ने संसद में बताया कि 2024 में देशभर में 37.17 लाख कुत्तों के काटने के मामले दर्ज किए गए, साथ ही 54 संदिग्ध रेबीज से होने वाली मानव मौतें हुईं। तमिलनाडु के शिवगंगा से लोकसभा सांसद चिदंबरम ने एक्स पर इस मुद्दे को उठाते हुए लिखा, “हम इसे अब और नजरअंदाज नहीं कर सकते!“ राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के आंकड़ों से पता चलता है कि रेबीज की रोकथाम के बावजूद भारत में हर साल 18,000 से 20,000 लोग इस बीमारी से मरते हैं जिसमें 15 साल से कम उम्र के बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
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कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में कुत्तों के काटने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। कर्नाटक में पिछले छह महीनों में 2.3 लाख से अधिक मामले और 19 रेबीज से मौतें दर्ज की गईं जबकि पूरे 2024 में 3.6 लाख मामले और 42 मौतें हुईं। केंद्र सरकार ने 2030 तक रेबीज उन्मूलन का लक्ष्य रखा है और इसके लिए राज्यों को पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत रेबीज रोधी टीकों के लिए वित्तीय सहायता दी जा रही है। बेंगलुरु में ब्रुहत बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) ने लगभग 4,000 आवारा कुत्तों को खिलाने के लिए 2.88 करोड़ रुपये की योजना शुरू की है ताकि उनकी नसबंदी और टीकाकरण आसान हो सके।
कड़े कदम उठाने की जरूरत
केरल सरकार भी इस संकट से निपटने के लिए कड़े कदम उठा रही है। स्थानीय स्वशासन मंत्री एम बी राजेश ने घोषणा की कि राज्य में 152 ब्लॉकों में मोबाइल नसबंदी इकाइयां शुरू की जाएंगी और गंभीर रूप से बीमार आवारा जानवरों की इच्छामृत्यु को मंजूरी दी गई है। इस साल अप्रैल से केरल में चार बच्चों की कुत्तों के काटने से मृत्यु हो चुकी है, भले ही उन्हें रेबीज रोधी टीका दिया गया था। पशुपालन विभाग के 158 प्रशिक्षित कर्मचारियों को आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए तैनात किया गया है।
जागरूकता अभियान शुरू करने जा रहे
इसके अलावा, केरल स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग 30 जून से सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में रेबीज रोकथाम और आवारा जानवरों के आसपास सुरक्षा के बारे में जागरूकता अभियान शुरू करने जा रहे हैं। जैसे-जैसे कुत्तों के काटने के मामले बढ़ रहे हैं और रेबीज एक घातक खतरा बना हुआ है, सांसदों और नागरिकों की ओर से तत्काल और समन्वित कार्रवाई की मांग तेज हो रही है। प्रभावी नीति, जागरूकता और बुनियादी ढांचे के जरिए इस समस्या से निपटने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।