इस सप्ताह राज्यसभा में पर्यावरण मंत्रालय के कामकाज पर चर्चा के दौरान दिल्ली की हवा सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरी। AAP सांसद स्वाति मालीवाल ने सीधे कहा कि राजधानी में सांस लेना अब सामान्य नागरिक के लिए रोज का स्वास्थ्य जोखिम है, और सरकारों की धीमी कार्रवाई ने इसे खतरनाक मोड़ पर पहुंचा दिया है।
उनका स्वर सिर्फ राजनीतिक नहीं था, सीधा और टकराव वाला था। मालीवाल ने सदन में कहा कि दिल्ली का प्रदूषण अब मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की जिंदगी, बच्चों के फेफड़ों और बुजुर्गों की सांस से जुड़ा संकट है। उनके मुताबिक जब हालात इतने खराब हों कि डॉक्टर लोगों को कुछ समय के लिए शहर छोड़ने की सलाह दें, तब यह प्रशासनिक असफलता का मामला बन जाता है।
सांस लेना इलाज से महंगा क्यों पड़ रहा है?
मालीवाल ने बहस के दौरान कुछ कड़े दावे रखे। उन्होंने कहा कि 2023 में दिल्ली में हुई कुल मौतों में करीब 15 प्रतिशत मामले वायु प्रदूषण से जुड़े थे। साथ ही, लगभग 22 लाख बच्चों के फेफड़ों को स्थायी नुकसान का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने सवाल किया कि अगर यह आंकड़े भी सिस्टम को नहीं जगा रहे, तो आखिर कौन सा अलार्म बाकी है।
उन्होंने यह भी कहा कि 2025 में दिल्ली में एक भी दिन हवा अच्छी श्रेणी में दर्ज नहीं हुई। इसी संदर्भ में उनका वह बयान चर्चा में रहा जिसमें उन्होंने कहा कि दिल्ली में एक दिन सांस लेना करीब 50 सिगरेट पीने के बराबर है।
यही बात बहस का केंद्र बन गई।
GST छूट से राहत या मजबूरी की आधिकारिक मुहर?
सांस की इस आपदा के बीच मालीवाल ने एक व्यावहारिक प्रस्ताव रखा। उनकी मांग थी कि जब तक प्रदूषण पर ठोस नियंत्रण नहीं हो जाता, तब तक एयर प्यूरीफायर और वॉटर प्यूरीफायर जैसे जरूरी उपकरणों को GST से पूरी तरह मुक्त किया जाए ताकि मध्यमवर्गीय और निम्न आय वाले परिवार भी इन्हें खरीद सकें।
उनका तर्क साफ था: अगर सरकार नागरिकों को साफ हवा नहीं दे पा रही, तो कम से कम उन्हें अपने घर के भीतर सुरक्षा के साधन सस्ते दाम पर उपलब्ध कराए। उन्होंने इसे उपभोक्ता सुविधा नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप की श्रेणी में रखा।
आयोग के हाथ बंधे रहेंगे तो जिम्मेदारी कौन लेगा?
मालीवाल ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग, यानी CAQM, की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आयोग को नौकरशाही दबाव से अलग कर पूरी संस्थागत स्वतंत्रता दी जानी चाहिए, ताकि निर्णय तकनीकी आधार पर हों, फाइल-आधारित देरी पर नहीं।
सांसद ने यह भी कहा कि ऐसे निकायों का नेतृत्व अनुभवी पर्यावरण विशेषज्ञों के पास होना चाहिए, सिर्फ प्रशासनिक नियंत्रण से प्रदूषण जैसे बहु-स्रोत संकट को नहीं संभाला जा सकता। उनके मुताबिक अधिकार, संसाधन और जवाबदेही तीनों एक साथ दिए बिना कोई भी आयोग कागजी संस्था बनकर रह जाता है।
10 हजार करोड़ का सवाल: पैसा आएगा तो खर्च कौन करेगा?
बहस में सबसे बड़ा वित्तीय प्रस्ताव 10 हजार करोड़ रुपये के विशेष फंड का रहा। मालीवाल ने कहा कि दिल्ली के प्रदूषण से स्थायी लड़ाई के लिए एक समर्पित फंड बने, जिसका उपयोग साफ लक्ष्य के साथ हो: स्रोत-आधारित नियंत्रण, निगरानी, स्थानीय हस्तक्षेप और समयबद्ध परिणाम।
इसी बिंदु पर उन्होंने दिल्ली सरकार के ग्रीन सेस खर्च पर भी सवाल उठाए। आरोप यह था कि 2015 से 2023 के बीच हरित उपकर से करीब 1500 करोड़ रुपये जुटाए गए, लेकिन खर्च आधे से कम हुआ। उन्होंने कहा कि कई बार खर्च अदालत के हस्तक्षेप के बाद आगे बढ़ा और प्रदूषण के नाम पर प्रचारात्मक होर्डिंग्स भी लगाए गए।
पराली जलाने के मुद्दे पर भी उन्होंने दोषारोपण की राजनीति की जगह वित्तीय समाधान की बात रखी। उनका सुझाव था कि किसानों को प्रति एकड़ 5 हजार रुपये की मदद दी जाए ताकि वे वैकल्पिक पराली प्रबंधन अपनाएं और हर सर्दी में दिल्ली-एनसीआर पर छिड़ने वाला आरोप-प्रत्यारोप कम हो।
राज्यसभा में रखी गई ये मांगें अब औपचारिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं। अगला दबाव इस पर रहेगा कि केंद्र सरकार GST राहत, CAQM स्वायत्तता और विशेष फंड पर स्पष्ट नीति रुख कब और किस रूप में सामने लाती है, क्योंकि दिल्ली की हवा इंतजार नहीं करती।






