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बसंत पंचमी: कहीं सरस्वती पूजा, कहीं पतंगबाजी तो कहीं लोकल ‘वैलेंटाइन डे’, जानिए देश के अलग-अलग राज्यों में कैसे मनाया जाता है वसंतोत्सव

Written by:Shruty Kushwaha
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बसंत बहार का आगमन, पीले रंग की छटा और विद्या की देवी सरस्वती की आराधना..बसंत पंचमी भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है जहां प्रकृति, आस्था और उल्लास एक-दूसरे में घुलमिल जाते हैं। खेतों में लहलहाती सरसों, पेड़ों पर नई कोपल की हरियाली और घर-आंगन में सजता पीला रंग जीवन में नई ऊर्जा और आशा का संदेश देता है। इसी भाव के साथ देशभर में सरस्वती पूजा, लोक उत्सव, संगीत-नृत्य और पतंगबाजी के रंग बिखरते हैं। कहीं यह ज्ञान और शिक्षा का पर्व बनता है तो कहीं प्रेम, मित्रता और सामाजिक उल्लास की अभिव्यक्ति का अवसर बन जाता है।
बसंत पंचमी: कहीं सरस्वती पूजा, कहीं पतंगबाजी तो कहीं लोकल ‘वैलेंटाइन डे’, जानिए देश के अलग-अलग राज्यों में कैसे मनाया जाता है वसंतोत्सव

Basant Panchami

आज देशभर में बसंत पंचमी का त्योहार उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की आराधना और वसंत ऋतु के आगमन के उल्लास के साथ यह पर्व शिक्षा, संस्कृति और प्रकृति के नवचक्र का प्रतीक माना जाता है। सुबह से ही मंदिरों, विद्यालयों और घरों में पूजा-अर्चना का क्रम शुरू हो गया है। वहीं सांस्कृतिक कार्यक्रमों और लोक उत्सव पर्व के रंग को और गहरा कर देते हैं।

माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर पड़ने वाला यह पर्व न सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि क्षेत्रीय परंपराओं, लोक उत्सवों और सांस्कृतिक रंगों से भी भरपूर है। इस दिन लोग पीले वस्त्र पहनते हैं, पीले फूल चढ़ाते हैं, पीले व्यंजन बनाए जाते हैं और मां सरस्वती को केसरिया हलवा, बूंदी लड्डू और पीले चावल प्रसाद के रूप में अर्पित करते हैं। इसी के साथ अलग अलग स्थानों की परंपराएं और लोकरंग भी इसमें शामिल होते हैं।

 बसंत पंचमी: उल्लास और श्रद्धा का पर्व 

बसंत पंचमी का त्योहार देश के हर कोने में अलग-अलग रूप में मनाया जाता है। हर स्थान की अपनी परंपराएं और मान्यताएं हैं। कहीं भव्य सरस्वती पूजा है तो कहीं पतंगबाजी का जोश..कहीं लोक संगीत और नृत्य की धूम है तो कहीं साहित्यिक उत्सव। आइए जानते हैं कि देश के अलग अलग हिस्सों में बसंत पंचमी किस तरह मनाई जाती है।

मध्यप्रदेश में माँ सरस्वती की पूजा

मध्य प्रदेश में बसंत पंचमी मुख्य रूप से माँ सरस्वती की पूजा के रूप में मनाई जाती है। घरों और मंदिरों में सुबह स्नान के बाद पीले या सफेद वस्त्र पहनकर पूजा की जाती है। देवी सरस्वती की मूर्ति या चित्र पर पीले फूल, फल और किताबें चढ़ाई जाती हैं। उज्जैन जैसे पवित्र स्थलों में विशेष आरती और भजन होते हैं। धार के भोजशाला में इस दिन विशेष पूजा की परंपरा है जहां सूर्योदय से सूर्यास्त तक अनुष्ठान होते हैं। इस दिन विद्यार्थी अपनी पुस्तकें और लेखन सामग्री देवी के समक्ष रखकर आशीर्वाद मांगते हैं। यहां प्रसाद के लिए पीला भोजन जैसे हलवा या लड्डू बनाए जाते हैं।

उत्तर प्रदेश में गंगा आरती और सरस्वती पूजा

उत्तर प्रदेश में बसंत पंचमी बड़े उत्साह से मनाई जाती है। वाराणसी के घाटों पर गंगा आरती के साथ सरस्वती पूजा होती है, जबकि प्रयागराज और मथुरा में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। लोग केसरी हलवा और बूंदी के लड्डू बनाकर देवी सरस्वसी को भोग लगाते हैं। यहां पतंगबाजी का विशेष महत्व है और आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। किसान इस दिन सरसों के फूलों की बहार देखकर खुशी मनाते हैं। नवविवाहित जोड़े मंदिरों में जाकर पूजा करते हैं। यहां ये पर्व नई शुरुआत, शिक्षा और कृषि से जुड़ा होता है।

बंगाल की भव्यता, स्थानीय वैलेंटाइन डे 

पश्चिम बंगाल में बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के रूप में सबसे धूमधाम से मनाया जाता है। घरों, स्कूलों और कॉलेजों में पंडाल सजाए जाते हैं जहां देवी सरस्वती की सुंदर मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। लोग पीले वस्त्र पहनते हैं और माता को फल-फूल और किताबें अर्पित करते हैं। छात्र अपनी पुस्तकें और वाद्ययंत्र देवी के चरणों में रखते हैं। यहां कई सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसे गायन, नृत्य और कविता पाठ होते हैं।

पश्चिम बंगाल में सरस्वती पूजा सिर्फ धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह युवाओं के बीच एक सामाजिक-सांस्कृतिक उत्सव का रूप भी ले चुकी है। इसे स्थानीय स्तर पर ‘बंगाली वैलेंटाइन डे’ कहा जाता है। कोलकाता और आसपास के शहरी इलाकों में बड़ी संख्या में युवा इसे प्रेम दिवस की तरह भी मनाते हैं। इस दिन कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पीले फूलों का आदान-प्रदान, दोस्तों के साथ घूमना और प्रेम का इज़हार करना आम दृश्य बन गया है।

बिहार में सूर्य देव से जुड़ी परंपराएं

बिहार में बसंत पंचमी सरस्वती पूजा और सूर्य देव से जुड़ी परंपराओं के साथ मनाई जाती है। औरंगाबाद जिले के देव सूर्य मंदिर में इस दिन विशेष उत्सव होता है, जहां सूर्य देव की प्राचीन मूर्ति की विशेष सजावट और पूजा की जाती है। घरों और स्कूलों में सरस्वती पूजा प्रमुख है, जिसमें छात्र किताबें देवी के समक्ष रखते हैं। यहां प्रसाद के रूप में खिचड़ी चढ़ाई जाती है। लोग पीले वस्त्र धारण करते हैं और सामुदायिक भोज आयोजित करते हैं। यहां ये पर्व ज्ञान के साथ कृषि और सूर्य की ऊर्जा से जुड़ा होता है, जो नई फसल की शुरुआत का प्रतीक है।

असम में सरस्वती पूजा

असम में बसंत पंचमी सरस्वती पूजा के रूप में मनाई जाती है जिसमें पारंपरिक संगीत, नृत्य और कला के कार्यक्रम होते हैं। घरों और मंदिरों में देवी सरस्वती की पूजा की जाती है, जहां पीले वस्त्र और फूलों का विशेष महत्व है। स्कूल-कॉलेजों में सामूहिक पूजा होती है। ये उत्सव पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है, जिसमें लोक नृत्य और भजन शामिल होते हैं। असम में यह पर्व ज्ञान और रचनात्मकता के साथ प्रकृति के उत्सव के रूप में भी देखा जाता है।

राजस्थान में पतंगबाजी

राजस्थान में बसंत पंचमी बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। लोग पीले वस्त्र पहनते हैं और चमेली की माला पहनने की भी परंपरा है। घरों को पीले फूलों से सजाया जाता है। जयपुर और अन्य शहरों में लोक संगीत, नृत्य और पतंगबाजी के आयोजन होते हैं। इस दिन नवविवाहित जोड़े मंदिर जाकर पूजा करते हैं। यहां पर्व पीले रंग की प्रधानता और लोककला के साथ जुड़ा होता है, जो राजस्थानी संस्कृति की जीवंतता को दर्शाता है।

गुजरात में रंगों का मेला

गुजरात में बसंत पंचमी प्रेम और भावनाओं से जुड़ी होती है। लोग फूलों के गुलदस्ते और आम के पत्तों से सजी मालाएं उपहार के रूप में देते हैं। अहमदाबाद और गांधीनगर में पतंगबाजी की बड़ी प्रतियोगिताएँ आयोजित होती हैं। पीले वस्त्र और फूलों का विशेष महत्व है।

महाराष्ट्र में श्री पंचमी

महाराष्ट्र में बसंत पंचमी को श्री पंचमी के रूप में मनाया जाता है। सुबह स्नान के बाद शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। नवविवाहित जोड़े इस दिन मंदिर जाकर पूजा करते हैं और पीले वस्त्र धारण करते हैं। कुछ स्थानों पर सरस्वती पूजा भी होती है। पतंगबाजी और सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रचलित हैं। यहां पर्व नई शुरुआत और पारिवारिक उत्सव का प्रतीक है।

पंजाब और हरियाणा में कृषि का उत्सव

पंजाब और हरियाणा में बसंत पंचमी को ‘बसंत’ के नाम से जाना जाता है। सरसों के पीले खेतों की बहार देखकर लोग खुशी मनाते हैं। पतंगबाजी मुख्य आकर्षण है जहां आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से पट जाता है। गुरुद्वारों और मंदिरों में पूजा होती है। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में राग बसंत का कीर्तन होता है। यहां उत्सव कृषि, खुशी और खेलकूद से भरपूर होता है।

ओडिशा में देवी सरस्वती की पूजा

ओडिशा में बसंत पंचमी को बसंत पंचमी, श्री पंचमी या सरस्वती पूजा के रूप में मनाया जाता है। मंदिरों और घरों में देवी सरस्वती की पूजा होती है। सांस्कृतिक कार्यक्रम और भजन-कीर्तन प्रमुख हैं। यहां पर्व ज्ञान और कला के साथ ओडिशा की समृद्ध परंपरा को दर्शाता है।

छत्तीसगढ़ में शिव-पार्वती की आराधना

छत्तीसगढ़ में बसंत पंचमी सरस्वती पूजा और शिव-पार्वती की आराधना के साथ मनाई जाती है। यहां घरों में पीले वस्त्र पहनकर पूजा की जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोक गीत और नृत्य होते हैं। यहां उत्सव शांत, धार्मिक और लोक संस्कृति से जुड़ा होता है।

दक्षिण भारत में शांतिपूर्ण धार्मिक उत्सव

दक्षिण भारत (तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल) में बसंत पंचमी को श्री पंचमी या सरस्वती पूजा के रूप में मनाया जाता है। यहां ये उत्सव उत्तरी राज्यों की तुलना में अधिक शांतिपूर्ण और धार्मिक होता है। मंदिरों में विशेष पूजा और आरती होती है। विद्यार्थी शिक्षा की शुरुआत (अक्षराभ्यास) इस दिन करते हैं। पीले वस्त्र पहनकर पूजा की जाती है लेकिन पतंगबाजी या बड़े पंडाल कम देखने को मिलते हैं। कुछ स्थानों पर यह नवरात्रि पर्व की तरह मनाया जाता है जहां औजारों की पूजा भी शामिल होती है। यहां त्योहार मुख्य रूप से शिक्षा, कौशल और आध्यात्मिकता पर आधारित है।

(डिस्क्लेमर: ये लेख विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त जानकारियों पर आधारित है। हम इसे लेकर कोई दावा नहीं करते हैं। )