इस बार दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी डूसू का चुनाव कुछ खास होने जा रहा है। करीब 17 साल बाद ऐसा मौका है जब अध्यक्ष पद की दौड़ में महिला उम्मीदवार मजबूती से उतरी हैं। तीन में से दो छात्र संगठनों ने अपनी महिला प्रत्याशी घोषित की हैं, जिससे चुनाव ऐतिहासिक बनने की ओर बढ़ रहा है। छात्र राजनीति में महिला नेतृत्व की वापसी से उत्साह का माहौल है। वहीं, चुनाव को ईको फ्रेंडली बनाने और प्रत्याशियों के लिए बॉन्ड की अनिवार्यता जैसे बदलाव भी इसे खास बना रहे हैं। छात्र इसे बदलाव का मौका मान रहे हैं।

एनएसयूआई ने जोसलीन पर लगाया दांव

एनएसयूआई ने इस बार अध्यक्ष पद के लिए जोसलीन नंदिता चौधरी को प्रत्याशी बनाया है। संगठन का कहना है कि यह कदम छात्र राजनीति में महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने और नई ऊर्जा लाने की कोशिश है। साथ ही उपाध्यक्ष पद के लिए राहुल झाँसला, सचिव पद के लिए कबीर और संयुक्त सचिव पद के लिए लवकुश भड़ाना को चुनाव मैदान में उतारा गया है। जोसलीन की उम्मीदवारी को छात्रों के बीच अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। एनएसयूआई का मानना है कि महिला नेतृत्व से कैंपस में संवेदनशील मुद्दों को बेहतर तरीके से उठाया जा सकेगा।

एबीवीपी और SFI-AISA का पैनल

एबीवीपी ने अध्यक्ष पद पर आर्यन मान को उतारा है, जबकि संयुक्त सचिव पद के लिए दीपिका झा को उम्मीदवार बनाया है। इससे संगठन ने भी महिला प्रतिनिधित्व को स्थान दिया है। वहीं, SFI-AISA गठबंधन ने अध्यक्ष पद पर अंजलि को उतारा है, जो कई छात्र आंदोलनों की अगुवाई कर चुकी हैं। अंजलि ने DU खुलवाने, महिला छात्रावास की मांग, यौन उत्पीड़न के खिलाफ और बाढ़ राहत कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई है। इनके साथ उपाध्यक्ष सोहन कुमार, सचिव अभिनंदना और संयुक्त सचिव अभिषेक कुमार चुनाव में शामिल हैं। इससे छात्र राजनीति में महिला भागीदारी को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

महिला नेतृत्व की वापसी और बदलाव की उम्मीद

2008 के बाद पहली बार डूसू में महिला अध्यक्ष बनने की संभावना मजबूत हुई है। जोसलीन और अंजलि के बीच सीधा मुकाबला है, जबकि एबीवीपी ने भी महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया है। छात्र इसे बदलाव की शुरुआत मान रहे हैं। वहीं, इस बार चुनाव को ईको फ्रेंडली बनाने के लिए डीयू प्रशासन ने कई पाबंदियाँ लागू की हैं। साथ ही प्रत्याशियों के लिए एक लाख रुपये का बॉन्ड अनिवार्य कर दिया गया है। ये बदलाव चुनाव को हाईलाइट कर रहे हैं। छात्र इसे न केवल चुनाव बल्कि नेतृत्व में बदलाव और सामाजिक जागरूकता का मौका मान रहे हैं। नई शुरुआत की उम्मीद जगी है।