हर साल 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती को देश ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाता है। भारत की आजादी के प्रति उनका ‘पराक्रम’ क्रांतिकारी विचारों और आजाद हिंद फौज से दिखा था। आजाद हिंद फौज के माध्यम से बोस ने साहस, अनुशासन और नेतृत्व दिखाया था। शुक्रवार को सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती के अवसर पर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का नाम बदलने का प्रस्ताव सामने आया है।
बता दें कि तेलंगाना जागृति की फाउंडर और निजामाबाद सीट से पूर्व सांसद कलवाकुन्तल कविता ने केंद्र की मोदी सरकार से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का नाम बदलकर ‘आजाद हिंद’ करने की मांग की है। इस संबंध में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा है।
पूर्व सांसद के कविता ने कहा कि पिछले कुछ सालों में सरकार ने आजाद हिंद सेना और नेताजी का सम्मान किया है। सरकार ने यहां के तीन द्वीपों का नाम भी बदला गया है, लेकिन अभी भी पूरे द्वीप समूह का नाम औपनिवेशक सत्ता के दौरान रखा गया ही है। उन्होंने केंद्र सरकार से नाम परिवर्तन को प्रभावी बनाने के लिए संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाएं शुरू करने का आग्रह किया।
30 दिसंबर 1943 को नेताजी ने पोर्ट ब्लेयर में फहराया था राष्ट्रीय ध्वज
पूर्व सांसद ने पत्र में कहा कि पराक्रम दिवस के अवसर पर, मैं राष्ट्रीय इतिहास को पुनः प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम का औपचारिक प्रस्ताव रखने के लिए लिख रही हूं कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का नाम बदलकर ‘आज़ाद हिंद’ करना चाहिए। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती मनाते हुए, हमें याद रखना चाहिए कि 30 दिसंबर 1943 को नेताजी ने पोर्ट ब्लेयर में राष्ट्रीय ध्वज फहराया और इन द्वीपों को औपनिवेशिक शासन से मुक्त होने वाला पहला भारतीय क्षेत्र घोषित किया। उन्होंने आजाद हिंद की अंतरिम सरकार के तत्वावधान में इन्हें ‘शहीद द्वीप’ और ‘स्वराज द्वीप’ नाम दिया।
‘आजाद हिंद’ की उपाधि राष्ट्र की संप्रभुता की पहली सांस का प्रमाण
यद्यपि हाल के वर्षों में कुछ द्वीपों के नाम बदले गए हैं, फिर भी द्वीपसमूह की सामूहिक पहचान ब्रिटिश राज द्वारा दिए गए नामों से ही जुड़ी हुई है। ‘आजाद हिंद’ नाम महज एक उपाधि नहीं है, बल्कि यह हमारे राष्ट्र की संप्रभुता की पहली सांस का प्रमाण है। यह कदम न केवल देशभक्ति से ओतप्रोत नाम को अमर करेगा, बल्कि नेताजी के योगदान को हमारे संप्रभु गणराज्य के भूगोल में अमिट रूप से अंकित करेगा। यह हमारे युवाओं के लिए एक शाश्वत प्रकाशस्तंभ के रूप में कार्य करेगा, जो उन्हें उन बलिदानों की याद दिलाएगा जिन्होंने हमारी स्वतंत्रता को गढ़ा।





