भारतीय सेना की गिनती दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में होती है। अंतरराष्ट्रीय रक्षा आकलनों में भारत अक्सर शीर्ष चार सैन्य ताकतों में शुमार रहता है। आधुनिक हथियार और मिसाइलें सेना की ताकत जरूर हैं, लेकिन इसका असली लोहा वे सैनिक मनवाते हैं जो सीमा पर डटे हैं। भारतीय सेना की कुछ विशिष्ट रेजिमेंट्स अपने अदम्य साहस और युद्ध कौशल के लिए पूरी दुनिया में विख्यात हैं।
चाहे कारगिल की ऊंची चोटियां हों या घने जंगल, इन रेजिमेंट्स ने हर बार अपनी काबिलियत साबित की है। यहां हम भारतीय सेना की उन 5 प्रमुख रेजिमेंट्स के बारे में बता रहे हैं, जिनका इतिहास वीरता की मिसालों से भरा है।
गोरखा रेजिमेंट: खुकरी की चमक और दुश्मन में खौफ
गोरखा रेजिमेंट का नाम सुनते ही दुश्मन के खेमे में हलचल मच जाती है। इस रेजिमेंट की स्थापना 24 अप्रैल 1815 को हुई थी। गोरखा सैनिकों की पहचान उनकी पारंपरिक ‘खुकरी’ है, जो क्लोज कॉम्बैट यानी आमने-सामने की लड़ाई में बेहद घातक हथियार साबित होती है।
इनका युद्ध उद्घोष ‘जय महाकाली, आयो गोरखाली’ रणभूमि में गूंजते ही दुश्मनों का मनोबल तोड़ देता है। गोरखा जवानों की ट्रेनिंग भारतीय सेना की सबसे कठिन प्रशिक्षण प्रक्रियाओं में से एक मानी जाती है। अनुशासन और निडरता ही इस रेजिमेंट की असली पहचान है।
पैराशूट रेजिमेंट: सर्जिकल स्ट्राइक के मास्टर
हवा से उतरकर दुश्मन का काम तमाम करने में माहिर पैराशूट रेजिमेंट (Para Regiment) सेना की सबसे खतरनाक स्पेशल फोर्स मानी जाती है। इस रेजिमेंट के कमांडो दुश्मन के इलाके में घुसकर अचानक हमला करने में विशेषज्ञ होते हैं।
वर्ष 2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक में पैरा कमांडो की भूमिका निर्णायक रही थी। इसके अलावा कारगिल युद्ध के दौरान मुश्कोह घाटी में इस रेजिमेंट की 6 और 7 बटालियन ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया था। इसकी ट्रेनिंग इतनी सख्त होती है कि बहुत कम सैनिक ही ‘मरून बेरे’ (Maroon Beret) पहनने का गौरव हासिल कर पाते हैं।
राजपूत रेजिमेंट: कारगिल में फहराया था तिरंगा
राजपूत रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे पुरानी और सम्मानित इकाइयों में से एक है। इसकी स्थापना 1 अगस्त 1940 को फैजाबाद में की गई थी। ‘सर्वत्र विजय’ के आदर्श वाक्य के साथ आगे बढ़ने वाली यह रेजिमेंट अपनी वीरता और बलिदान की परंपरा के लिए जानी जाती है।
इतिहास गवाह है कि कारगिल युद्ध में तोलोलिंग जैसी दुर्गम पहाड़ी पर कब्जा करने में राजपूत रेजिमेंट ने अहम भूमिका निभाई थी। जूनागढ़ के भारत में विलय के दौरान भी इस रेजिमेंट के जवानों ने अदम्य साहस का परिचय दिया था।
कुमाऊं रेजिमेंट: 18वीं सदी से चला आ रहा इतिहास
कुमाऊं रेजिमेंट की जड़ें इतिहास में काफी गहरी हैं। इसे 18वीं सदी में भी एक सैन्य बल के रूप में पहचाना जाता था। वर्ष 1794 में इसे रामेंट कोर कहा जाता था, जिसे बाद में 27 अक्टूबर 1945 को कुमाऊं रेजिमेंट का नाम मिला।
इस रेजिमेंट ने आंग्ल-नेपाल युद्ध सहित कई बड़े सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया है। पहाड़ी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में लड़ने की इनकी क्षमता इन्हें बाकी सेनाओं से अलग बनाती है। अनुशासन और साहस इस रेजिमेंट के पर्याय माने जाते हैं।
बिहार रेजिमेंट: 1971 युद्ध में दिखाया था दम
बिहार रेजिमेंट अपने धैर्य और कठिन हालात में मोर्चे पर डटे रहने के लिए प्रसिद्ध है। इसकी स्थापना 1 नवंबर 1945 को आगरा में लेफ्टिनेंट कर्नल आर. सी. म्यूलर के नेतृत्व में हुई थी।
इस रेजिमेंट ने द्वितीय विश्व युद्ध में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। वहीं, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में बिहार रेजिमेंट के जवानों ने शानदार प्रदर्शन किया था। यह रेजिमेंट हर परिस्थिति में देश की रक्षा के लिए तैयार रहती है।
ये रेजिमेंट्स महज सैन्य टुकड़ियां नहीं हैं, बल्कि ये भारत की एकता और अखंडता की प्रहरी हैं। इन्हीं के बलिदान और शौर्य के कारण भारतीय सेना पर देशवासियों का भरोसा और दुनिया का सम्मान कायम है।





