पश्चिम बंगाल की राजनीति में मतदाता सूची अब सबसे बड़ा टकराव का मुद्दा बनती दिख रही है। रविवार को कोलकाता में धरना मंच से बोलते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चुनाव आयोग पर सीधे सवाल उठाए। उनका आरोप था कि राज्य में चल रही विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान कई मतदाताओं के नाम मनमाने तरीके से हटाए जा रहे हैं।

“अगर यही मतदाता सूची 2024 में थी, जिसके आधार पर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो फिर अब उसी सूची से लोगों को वोट देने से क्यों रोका जा रहा है।” — ममता बनर्जी

मुख्यमंत्री ने अपने बयान में यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया में भरोसा तभी बना रह सकता है, जब सूची से जुड़े फैसले नियम आधारित हों और किसी योग्य नागरिक का नाम बिना ठोस कारण के न हटे। उनके मुताबिक, यह केवल प्रशासनिक सवाल नहीं, बल्कि सीधे तौर पर लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मामला है।

जवाबदेही की मांग और प्रधानमंत्री पर सीधा निशाना

ममता बनर्जी ने कहा कि अगर मतदाता सूची में गड़बड़ी की बात सामने आ रही है, तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। इसी क्रम में उन्होंने प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग की और तर्क दिया कि वे भी इसी मतदाता सूची के आधार पर चुने गए थे।

उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का नाम लेते हुए कहा कि चुनाव आयोग को निष्पक्षता पर कोई संदेह नहीं रहने देना चाहिए। ममता का कहना था कि आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सूची संशोधन की प्रक्रिया में किन आधारों पर नाम हटाए जा रहे हैं और प्रभावित लोगों के लिए सुधार का व्यावहारिक रास्ता क्या है।

“अगर सूची में गड़बड़ी है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।” — ममता बनर्जी

चुनाव से पहले नाम हटाने की कार्रवाई पर आपत्ति

मुख्यमंत्री का मुख्य आरोप यह रहा कि चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने की आशंका लोकतंत्र के लिए ठीक संकेत नहीं है। उन्होंने कहा कि मतदान सूची किसी भी चुनाव की बुनियादी दस्तावेज होती है, इसलिए इसमें पारदर्शिता, सत्यापन और आपत्ति निवारण की प्रक्रिया मजबूत होनी चाहिए।

उनके मुताबिक, यदि पात्र मतदाता सूची से बाहर हो जाते हैं तो इसका सीधा असर मतदान प्रतिशत, प्रतिनिधित्व और चुनावी निष्पक्षता पर पड़ सकता है। उन्होंने चुनाव आयोग से अपील की कि सूची पुनरीक्षण के हर चरण में सार्वजनिक स्पष्टता रखी जाए, ताकि बाद में विवाद की गुंजाइश कम हो।

ममता बनर्जी ने मंच से यह भी कहा कि प्रशासनिक प्रक्रिया का मकसद अधिकारों का संरक्षण होना चाहिए, न कि किसी नागरिक को मतदान से वंचित करना। उन्होंने जोर देकर कहा कि मतदाता अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए और आयोग को इस सिद्धांत पर सख्ती से काम करना चाहिए।

राज्यपाल और उपराष्ट्रपति के इस्तीफों का भी उठाया मुद्दा

SIR विवाद के बीच ममता बनर्जी ने दो पुराने संवैधानिक पदों से जुड़े इस्तीफों का जिक्र भी किया। उन्होंने कहा कि राज्यपाल का कार्यकाल अभी लगभग तीन साल बाकी था, फिर 5 मार्च को अचानक इस्तीफा क्यों दिया गया। इस मामले में उन्होंने जांच की मांग रखी।

मुख्यमंत्री ने भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के पिछले साल जुलाई में दिए गए इस्तीफे का भी उल्लेख किया और सवाल किया कि क्या ऐसे मामलों की भी पड़ताल होनी चाहिए। उनका कहना था कि सार्वजनिक पदों से जुड़े अचानक फैसलों के कारणों को जनता के सामने स्पष्ट किया जाना चाहिए।

हालांकि इन दोनों संदर्भों में उन्होंने जांच की मांग के रूप में बात रखी और यह कहा कि पारदर्शिता लोकतांत्रिक संस्थाओं में भरोसा बढ़ाती है।

SIR पर राजनीतिक तापमान और आगे की दिशा

पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर पहले से चल रहे विवाद को मुख्यमंत्री के इस बयान ने और राजनीतिक बना दिया है। एक तरफ राज्य सरकार की ओर से मतदाता नाम हटने के आरोप हैं, दूसरी तरफ चुनावी प्रक्रिया को लेकर निष्पक्षता और वैधानिकता का प्रश्न केंद्र में आ गया है।

ममता बनर्जी का संदेश स्पष्ट रहा कि 2024 में जिन सूचियों के आधार पर जनादेश बना, उसी ढांचे में अब बदलाव या हटाने की कार्रवाई को लेकर विस्तृत और सार्वजनिक जवाब आवश्यक है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी पात्र मतदाता सूची से बाहर न रह जाए।

फिलहाल इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी तेज है, और आने वाले दिनों में यह बहस मतदाता सत्यापन, नाम विलोपन और अपील प्रक्रिया जैसे तकनीकी बिंदुओं पर और केंद्रित हो सकती है।