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सावन में पहली बार होगा ऐसा, अयोध्या के राम मंदिर में सीता माता संग झूला झूलेंगे श्रीराम

Written by:Rishabh Namdev
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अयोध्या में इस बार सावन बेहद खास होने जा रहा है। राम मंदिर निर्माण के बाद यह पहला झूलनोत्सव होगा जब भगवान श्रीराम माता सीता के संग रत्नजड़ित झूले पर विराजमान होंगे। पांच सौ साल के इंतजार के बाद रामलला के भव्य मंदिर में यह अनोखा नज़ारा भक्तों को देखने को मिलेगा।
सावन में पहली बार होगा ऐसा, अयोध्या के राम मंदिर में सीता माता संग झूला झूलेंगे श्रीराम

इस बार अयोध्या का सावन भक्तों के लिए बेहद ऐतिहासिक होने जा रहा है। दरअसल रामलला के भव्य मंदिर में पहली बार झूलनोत्सव का आयोजन होगा, जिसमें भगवान श्रीराम माता सीता के साथ झूले पर विराजमान होंगे। मंदिर निर्माण प्रभारी गोपाल राव ने बताया कि आयोजन की तैयारियां शुरू हो गई हैं और एक रत्नजड़ित स्वर्ण झूले का निर्माण भी कराया जा रहा है।

हालांकि मंदिर के कुछ हिस्सों में अभी भी निर्माण कार्य जारी है, इसलिए उत्सव को फिलहाल सीमित दायरे में रखा जाएगा, लेकिन भव्यता में कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। भक्तों में भी इसके लिए भारी उत्साह देखने को मिल रहा है।

राम मंदिर झूलनोत्सव की परंपरा

दरअसल राम मंदिर में झूलनोत्सव की परंपरा 1993 से जारी है, लेकिन इस बार की बात ही कुछ और है। यह पहली बार होगा जब राजा राम युगल सरकार के रूप में सीता माता संग झूले पर विराजेंगे। इससे पहले केवल रामलला और उनके अनुजों के लिए झूले की व्यवस्था होती थी, लेकिन अब उनके लिए भी नया रत्नजड़ित झूला तैयार किया जा रहा है। यह आयोजन अध्यात्म, भक्ति और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर होगा। वहीं सावन में अयोध्या के विभिन्न मंदिरों में अलग-अलग परंपराओं के अनुसार झूलनोत्सव मनाया जाता है। कहीं यह पूरे महीने चलता है, तो कहीं तृतीया से पूर्णिमा तक। राम मंदिर में पारंपरिक रूप से 5 दिनों तक यह उत्सव आयोजित किया जाता है। इस दौरान भक्त भजन, कीर्तन और झूला दर्शन के माध्यम से प्रभु के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।

राम मंदिर निर्माण की प्रगति

वहीं राम मंदिर निर्माण से जुड़ी भवन समिति की अगली बैठक 27 जून से अयोध्या में होगी। चेयरमैन नृपेन्द्र मिश्र 26 जून को पहुंचेंगे और तीन दिनों तक निर्माण कार्यों की समीक्षा करेंगे। मंदिर की परकोटा योजना को अक्टूबर-नवंबर तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। दरअसल अयोध्या में झूलनोत्सव की शुरुआत मणि पर्वत से होती है, जहां विभिन्न मंदिरों से भगवान के स्वरूप लाकर झूले पर विराजमान कराए जाते हैं। फिर वहां भक्तिमय गीतों की प्रस्तुति होती है। यह पर्व न केवल श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि पांच सौ वर्षों के इंतजार के बाद पूरी हुई साधना और संकल्प की पूर्ति का सजीव उदाहरण भी है।

Rishabh Namdev
लेखक के बारे में
मैं ऋषभ नामदेव खेल से लेकर राजनीति तक हर तरह की खबर लिखने में सक्षम हूं। मैं जर्नलिज्म की फील्ड में पिछले 4 साल से काम कर रहा हूं। View all posts by Rishabh Namdev
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