पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले चुनावी माहौल अचानक और अधिक राजनीतिक हो गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग की फुल बेंच रविवार शाम को कोलकाता पहुंच रही है, लेकिन उससे ठीक पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग की भूमिका पर खुला हमला बोला है।
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि वैध मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश हो रही है और इसके लिए चुनाव आयोग का दुरुपयोग किया जा रहा है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक ढांचे पर सीधा दबाव बनाया जा रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है, जब राज्य में मतदान कार्यक्रम की घोषणा को लेकर अटकलें तेज हैं।
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एक राष्ट्र, एक नेता, एक पार्टी की बात करने वाली BJP सुनियोजित तरीके से लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक पदों का गलत इस्तेमाल कर रही है।- ममता बनर्जी
आयोग का दौरा: सोमवार को अहम बैठकों का दिन
चुनाव आयोग की टीम सोमवार को राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, पुलिस अधिकारियों और राज्य के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक करेगी। इन बैठकों को चुनावी तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि मतदाता सूची, सुरक्षा व्यवस्था और चुनाव कार्यक्रम जैसे मुद्दों पर राजनीतिक दल लगातार सवाल उठा रहे हैं।
आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सोमवार सुबह कालीघाट मंदिर जाएंगे और पूजा करेंगे। इसके बाद दिन में बैठकों का सिलसिला तय है। मंगलवार को उनके बेलूर मठ जाने का भी कार्यक्रम है।
ममता बनर्जी के आरोपों का केंद्र क्या है
मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए उसे वैनिश कमीशन कहा। उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया वैध मतदाताओं को सूची से हटाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। उन्होंने कहा कि वर्षों से केंद्रीय एजेंसियों, राष्ट्रीय आयोगों और न्यायपालिका के एक हिस्से को बंगाल के खिलाफ खड़ा किया गया है।
ममता बनर्जी का यह भी कहना है कि लोकतांत्रिक नींव पर अभूतपूर्व और सीधा हमला किया जा रहा है। उनके बयान का राजनीतिक संदेश साफ है: चुनाव से पहले मतदाता सूची और संस्थागत निष्पक्षता का मुद्दा विपक्ष और सत्तारूढ़ दल के बीच बड़े टकराव का आधार बन सकता है।
वे बर्बाद हो चुके आयोग का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकें।- ममता बनर्जी
SIR सूची, 60 लाख नाम और चुनाव कार्यक्रम पर अनिश्चितता
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में SIR की फाइनल लिस्ट भी है, जो 28 फरवरी को प्रकाशित हुई थी। जानकारी के मुताबिक, अब भी करीब 60 लाख नाम अनसुलझी सूची में हैं। यही वह बिंदु है जिस पर कई राजनीतिक दलों ने सवाल उठाए हैं।
कुछ दलों ने मांग की है कि जब तक इन अनसुलझे नामों का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक चुनाव नहीं कराए जाएं। इस मांग ने चुनाव कार्यक्रम की समयरेखा को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
क्या आयोग राजनीतिक दलों से बातचीत के बाद कोई त्वरित फैसला करेगा? फिलहाल इस पर स्पष्ट संकेत नहीं है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल ने भी कहा है कि उन्हें मतदान कार्यक्रम के बारे में जानकारी नहीं है और इस पर अंतिम निर्णय आयोग ही करेगा।
आगे क्या देखना होगा
आयोग की इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सोमवार की बैठकें होंगी। मतदाता सूची में लंबित मामलों, राजनीतिक दलों की आपत्तियों और प्रशासनिक तैयारियों पर आयोग किस रुख के साथ आगे बढ़ता है, उसी से चुनाव कार्यक्रम की दिशा तय होगी।
फिलहाल तस्वीर यह है कि एक तरफ आयोग का औपचारिक परामर्श दौर शुरू हो रहा है, दूसरी तरफ मुख्यमंत्री के आरोपों ने चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। बंगाल में चुनाव की तारीखों का इंतजार जारी है, लेकिन उससे पहले मतदाता सूची का विवाद अब निर्णायक मुद्दा बन चुका है।