कोलकाता: तमिलनाडु में एमके स्टालिन सरकार के साथ लगातार टकराव के लिए चर्चा में रहे आरएन रवि ने अब पश्चिम बंगाल के नए राज्यपाल का पदभार संभाल लिया है। कोलकाता स्थित लोक भवन में आयोजित एक समारोह में उन्होंने पद और गोपनीयता की शपथ ली। कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल ने उन्हें शपथ दिलाई।

शपथ ग्रहण समारोह में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती, विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी और वाम मोर्चा के चेयरमैन बिमान बोस समेत कई वरिष्ठ नेता और अधिकारी उपस्थित थे। समारोह की शुरुआत और समापन राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के साथ हुआ। शपथ लेने के बाद नए राज्यपाल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अन्य मेहमानों से मुलाकात की।

बंगाल की धरती को किया नमन

पदभार संभालने के बाद राज्यपाल रवि ने अपने बयान में पश्चिम बंगाल को भारत की आध्यात्मिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक राजधानी बताया। उन्होंने कहा कि वह इस महान भूमि के लोगों की सेवा करने का अवसर पाकर खुद को बहुत सौभाग्यशाली और विनम्र महसूस कर रहे हैं।

“यह वह भूमि है जहां हजारों साल पहले वेदों का शाश्वत ज्ञान फला-फूला, जहां गौतम बुद्ध की शिक्षाओं को नए भाव मिले, जहां भक्ति की महान परंपरा फली-फूली और जिसने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाया।”- राज्यपाल आरएन रवि

उन्होंने चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, श्री अरबिंदो, सुभाष चंद्र बोस और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महापुरुषों को याद करते हुए बंगाल के गौरवशाली इतिहास को सराहा। उन्होंने कहा, “मैं मां दुर्गा से इस भूमि के लोगों की पूरी श्रद्धा से सेवा करने के लिए बुद्धि और शक्ति देने की प्रार्थना करता हूं।”

तमिलनाडु में कैसा रहा कार्यकाल?

आरएन रवि को सीवी आनंद बोस के इस्तीफे के बाद पश्चिम बंगाल का स्थायी राज्यपाल नियुक्त किया गया है। इससे पहले वह तमिलनाडु के राज्यपाल थे, जहां उनका डीएमके सरकार के साथ कई मुद्दों पर लंबा टकराव चला। कई विधेयकों को मंजूरी देने में देरी को लेकर मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने उनकी शिकायत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भी की थी और उन्हें हटाने की मांग की थी।

अब जब उन्हें पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी मिली है, तो राजनीतिक हलकों में यह देखने की उत्सुकता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उनके संबंध कैसे रहेंगे। राज्य सरकार और राजभवन के बीच समन्वय भविष्य की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण पहलू होगा।