यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अदालतों की संवेदनशीलता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर चिंता जताई है। इस बार शीर्ष अदालत ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है, जिसमें कहा गया था कि किसी महिला की छाती दबाना और उसका सलवार उतारने का प्रयास, अपने आप में बलात्कार के प्रयास (Attempt to Rape) का अपराध सिद्ध नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी द्वारा तैयार की गई यौन अपराधों से निपटने की गाइडलाइंस को मंजूरी देते हुए सभी अदालतों और पुलिस को मानक शब्दावली का पालन करने का निर्देश दिया।
पटना हाईकोर्ट का फैसला
पटना हाईकोर्ट ने 9 जुलाई के अपने फैसले में कहा था कि यदि अभियोजन पक्ष ऐसे ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाता, जिनसे स्पष्ट रूप से बलात्कार के प्रयास का इरादा और उससे जुड़ा प्रत्यक्ष कृत्य साबित हो, तो सिर्फ सलवार उतारने की कोशिश और छाती दबाने जैसी हरकतें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376/511 (बलात्कार का प्रयास) के बजाय धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) के दायरे में आएंगी। इसी आधार पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई बलात्कार के प्रयास की सजा को निरस्त कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में उठा मामला
इस फैसले का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने उठाया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस वी. मोहना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने फैसले पर चिंता व्यक्त की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे मामलों में पर्याप्त कानूनी शोध और संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है। पीठ ने संकेत दिया कि वह पटना हाईकोर्ट के आदेश पर विस्तृत टिप्पणी करेगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का भी दिया संदर्भ
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि पीड़िता के स्तन छूना और पायजामे की डोरी तोड़ना, बलात्कार या उसके प्रयास की श्रेणी में नहीं आता। उस फैसले का सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था और 26 मार्च को उस पर रोक लगा दी थी। इसी प्रकरण के बाद यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की रिपोर्ट तैयार कराई गई थी। (
न्यायिक संवेदनशीलता पर सुप्रीम कोर्ट का जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायाधीशों का संवेदनशील और विधिसम्मत दृष्टिकोण बेहद महत्वपूर्ण है। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की न्यायिक संवेदनशीलता संबंधी रिपोर्ट को व्यापक रूप से उपलब्ध कराने की दिशा में भी कदम उठाए हैं, ताकि ऐसे मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण अधिक संतुलित और पीड़ित-केंद्रित हो सके।






