होली मतलब रंगों से सराबोर होना का पर्व। होली मतलब सारी तल्खियां भूल एक-दूसरे को गुलाल लगाने का पर्व। होली मतलब गुजिया, ठंडाई और मिठास से भरा पर्व। फाग गीतों की वो धुन जो सदियों से हमारे लोकजीवन का हिस्सा रही हैं।“फागुनवा में खेलें होली रे” या “अबीर गुलाल उड़ावें रे”। ये गीत ढोल-नगाड़ों की थाप में गूंजते हैं, दिलों को एक साथ लाते हैं।
भारत विविधताओं से भरा देश है। यहां पर पर्व-त्योहार के कई रंग देखने को मिलते हैं। होली भी ठीक वैसी ही है..एक ही त्योहार लेकिन हर कोने में अलग रंग, अलग अंदाज, अलग कहानी। कहीं जमकर रंग खेला जाता है तो कहीं लाठियां चलती हैं। कहीं फूलों की बारिश होती है तो कहीं सिर्फ गुलाल मला जाता है। कहीं शौर्य का प्रदर्शन होता है तो कहीं संगीत और नृत्य के रंग बिखरते हैं।
होली यानी रंगों और खुशियों का पर्व
हमारे यहां होली सिर्फ रंग और गुलाल तक सीमित नहीं है। यह हर क्षेत्र में वहां की अनोखी परंपराओं, लोककथाओं और रोचक रिवाजों के साथ मनाई जाती है। प्राचीन ब्रज से लेकर पंजाब की वीरता, वाराणसी की आध्यात्मिकता और बंगाल की कला तक..होली यही विविधता इसे और सुंदर रुप देती है। आइए जानते हैं कि कैसे एक ही त्योहार देश में कैसे अलग-अलग रंग बिखेरता है।
देश के अलग अलग हिस्सों में होली के रंग
उत्तर प्रदेश की लठमार और फूलों की होली: ब्रजभूमि (मथुरा-वृंदावन-बरसाना) में होली 40 दिन तक चलती है और दुनियाभर में मशहूर है। सबसे रोचक है लठमार होली। नंदगांव के पुरुष ढाल-तलवार लेकर बरसाना पहुंचते हैं, जहां महिलाएं हंसते-हंसते लाठियां चलाती हैं। कहते हैं, श्रीकृष्ण जब राधा से छेड़खानी करने आए थे तब गोपियों ने उन्हें लाठियों से भगाया था। यह परंपरा आज भी हंसी-मजाक में निभाई जाती है जहां पुरुष भागते हैं और महिलाएं उनके पीछे लठ्ठ लेकर दौड़ती है। ऐसे में पूरा माहौल गीतों से गूंजता है। वहीं वृंदावन की फूलों वाली होली में रंग की जगह गुलाब, चमेली और गेंदे की वर्षा होती है। बांकेबिहारी मंदिर में फूलों की ऐसी बौछार कि सुगंध से पूरा वातावरण महक उठता है।
वाराणसी की मसान होली: काशी में मसान होली या भस्म होली पर्यटकों के लिए सबसे हैरान कर देने वाली परंपरा है। मनिकर्णिका घाट पर श्मशान की राख (भस्म) को गुलाल की तरह इस्तेमाल किया जाता है। साधु और स्थानीय लोग इसे लगाते हैं, क्योंकि होली यहां सिर्फ रंग नहीं बल्कि मोक्ष और वैराग्य का प्रतीक भी है।
पंजाब का होला मोहल्ला: होली के अगले दिन आनंदपुर साहिब में होला मोहल्ला मनाया जाता है। गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा शुरू की गई यह परंपरा निहंग सिखों की तलवारबाजी, घुड़सवारी, कुश्ती और मार्शल आर्ट का भव्य प्रदर्शन है। रंगों की जगह ढोल-नगाड़े, झंडे और योद्धा शैली में ये ‘वीर होली’ मनाई जाती है। इसे देखने हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है।
पश्चिम बंगाल में बसंत उत्सव: शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर की परंपरा डोल उत्सव या बसंत उत्सव है। यहां रंग कम संगीत और नृत्य ज्यादा होता है। राधा-कृष्ण की मूर्तियां झूलों पर सजाई जाती हैं, विद्यार्थी रंग-बिरंगे वस्त्रों में नृत्य करते हैं और रवींद्र संगीत गूंजता है। यह होली वसंत ऋतु के स्वागत का सबसे काव्यात्मक रूप है।
उत्तराखंड की खड़ी और बैठक होली: कुमाऊं में खड़ी होली (खड़े होकर) और बैठकी होली (बैठकर) मनाई जाती है। ये रंग कम, और शास्त्रीय राग और लोकगीतों का मेला अधिक है। यहां स्थानीय लोग पारंपरिक वेशभूषा में घंटों गीत गाते हैं। यह होली संगीत प्रेमियों का स्वर्ग है।
महाराष्ट्र-गोवा में शिग्मो और रंग पंचमी: महाराष्ट्र में होली पूर्णिमा के बाद पांचवें दिन रंग पंचमी या और गोवा में शिग्मो के रूप में मनाई जाती है। इस दौरान मछुआरे और किसान लोकनृत्य करते हैं, मटकी फोड़ते हैं। गोवा में यह जुलूस और नृत्यों का उत्सव बन जाता है।
मणिपुर मका याओसांग: पूर्वोत्तर में याओसांग थाबल चोंगबा नृत्य के साथ मनाया जाता है। इस दौरान युवक युवती चांदनी रात में घेरा बनाकर नाचते हैं और खेल प्रतियोगिताएं होती हैं। ये हिंदू और आदिवासी संस्कृति का सुंदर संगम है।
राजस्थान की शाही होली: राजस्थान तो वैसे भी रंगों से भरा पूरा है। होली पर जयपुर-उदयपुर के राजमहलों में रॉयल होली मनाई जाती है। इस दौरान हाथियों पर सवारी, पारंपरिक संगीत और राजसी ठाठरंग के अंदाज बिखरते हैं।
मध्यप्रदेश में धुलेंडी का जोश: देश का दिल कहलाने वाले मध्यप्रदेश में होली को धुलेंडी के नाम से मनाया जाता है। होलिका दहन के बाद अगले दिन सुबह से रंग-पानी का खेल होता है, लोकगीत और ढोल की गूंज सुनाई देती है और स्वादिष्ट गुजिया-ठंडाई का स्वाद बिखरता है ।






