Fri, Jan 2, 2026

पट्टा मिलने के 14 साल बाद भी अपनी ही जमीन के लिए भटक रहे आदिवासी, कांग्रेस ने दी ‘कलेक्ट्रेट में डेरा’ डालने की चेतावनी

Reported by:Kamlesh Sarda|Edited by:Atul Saxena
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कांग्रेस ने कहा, वन विभाग और राजस्व विभाग की जमीन का आज तक स्पष्ट सीमांकन नहीं हुआ है। इसका फायदा उठाकर वन विभाग के अधिकारी अपनी मर्जी से 200-200 मीटर आगे बढ़कर बाउंड्री बना देते हैं और आदिवासियों को खदेड़ देते हैं।
पट्टा मिलने के 14 साल बाद भी अपनी ही जमीन के लिए भटक रहे आदिवासी, कांग्रेस ने दी ‘कलेक्ट्रेट में डेरा’ डालने की चेतावनी

Neemuch Congress Memorandum

नीमच जिले की जावद विधानसभा के अंतर्गत आने वाले ग्राम मांडा और महेन्द्री के आदिवासी परिवारों का दर्द एक बार फिर कलेक्ट्रेट में गूंजा। पट्टा होने के बावजूद जमीन पर कब्जा न मिलने से नाराज ग्रामीणों ने शुक्रवार को किसान नेता राजकुमार अहीर के नेतृत्व में कलेक्ट्रेट पहुंचकर प्रदर्शन किया और ज्ञापन सौंपा। इस दौरान राजकुमार अहीर ने वन विभाग के अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और दादागिरी के गंभीर आरोप लगाए हैं।

सरकारी फाइलों में जमीन मिली, मौके पर सिर्फ धक्के

ज्ञापन में बताया गया कि वर्ष 2002 में तत्कालीन तहसीलदार टप्पा रतनगढ़ द्वारा प्रकरण क्रमांक 53/ए/क्यू/1/2001-2002 के तहत पट्टा वितरण किया गया था। ग्राम मांडा महेन्द्री के 50 से अधिक आदिवासी परिवारों (विशेषकर 47 पट्टे) को सर्वे नंबर 3/2 की भूमि में एक-एक हेक्टेयर कृषि भूमि आवंटित की गई थी। लेकिन आज 13-14 साल बीत जाने के बाद भी ये परिवार अपनी जमीन के टुकड़े के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।

अहीर का आरोप- वन विभाग की दादागिरी और भ्रष्टाचार चरम पर

मीडिया से चर्चा करते हुए किसान नेता राजकुमार अहीर ने वीडियो में स्पष्ट तौर पर कहा कि भाजपा सरकार में आदिवासियों का सबसे ज्यादा शोषण हो रहा है। उन्होंने वन विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वन विभाग के अधिकारी रेवेन्यू (राजस्व) की जमीन पर पट्टाधारियों को कब्जा नहीं दे रहे, लेकिन उसी जमीन को दूसरे लोगों को देकर वहां खेती करवा रहे हैं और फसल में “आधा हिस्सा” (50%) कमीशन के तौर पर ले रहे हैं।

सीमांकन नहीं होने का फायदा उठा रहे वन विभाग के अधिकारी  

अहीर ने बताया कि दो दिन पहले वन विभाग ने जेसीबी मशीन ले जाकर उस जमीन पर खुदाई शुरू कर दी थी, जो राजस्व विभाग की है। जब तहसीलदार को सूचना दी गई, तो उन्होंने मौके पर पहुंचकर काम रुकवाया।  उन्होंने कहा कि वन विभाग और राजस्व विभाग की जमीन का आज तक स्पष्ट सीमांकन नहीं हुआ है। इसका फायदा उठाकर वन विभाग के अधिकारी अपनी मर्जी से 200-200 मीटर आगे बढ़कर बाउंड्री बना देते हैं और आदिवासियों को खदेड़ देते हैं।

रूपपुरा और अन्य गांवों में भी यही हाल

राजकुमार अहीर ने बताया कि यह समस्या सिर्फ एक गांव की नहीं है। जावद क्षेत्र में, अंबा डैम के पास और रूपपुरा में भी यही स्थिति है। रूपपुरा में जो लोग 50 साल से खेती कर रहे थे, उनकी मेड़ें वन विभाग ने तुड़वा दीं। दड़ोली पंचायत में 17 लोगों को पट्टे मिलने थे, लेकिन सिर्फ एक को मिला।

कलेक्ट्रेट में धरना और सड़क पर आंदोलन की चेतावनी

ज्ञापन सौंपते हुए अहीर ने प्रशासन को स्पष्ट अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने कहा, “कलेक्टर खुद मान चुके हैं कि वह जमीन राजस्व विभाग की है, वन विभाग का उस पर अधिकार नहीं है। इसके बावजूद अगर इन गरीबों को कब्जा नहीं दिलाया गया, तो हम यहीं कलेक्ट्रेट में अनिश्चितकालीन धरना देंगे और सड़कों पर उग्र आंदोलन करेंगे।”

कमलेश सारड़ा की रिपोर्ट