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संवेदनहीन होते सरकारी मुलाजिम, पति की मौत के बाद संबल की राशि पाने दर दर भटक रही महिला, कलेक्टर से लगाई गुहार

सरकार ने संबल योजना बनाई ही उन श्रमिकों के लिए है जिनकी मृत्यु अचानक हो जाती है और उनके परिवार के सामने भरण पोषण का संकट खड़ा हो जाता है लेकिन सरकारी कुर्सी पर बैठे जिन कर्मचारियों को उनका दर्द दिखाई नहीं देता उनपर एक्शन की जरुरत है।
Neemuch Collector Jansunwai

Neemuch Collector Jansunwai

नीमच जिले के भोलियावास गांव से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों और उनकी जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को उजागर करता है। सरकार ने जिन गरीब और श्रमिक परिवारों की सामाजिक सुरक्षा के लिए ‘संबल योजना’ बनाई थी, उसी योजना का लाभ पाने के लिए एक विधवा महिला को अपने दो नाबालिग बच्चों के साथ दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। सरकारी कार्यालयों में बैठे कर्मचारी उसे एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस भगा रहे हैं, 4 महीने से परेशान महिला ने आज जनसुनवाई में कलेक्टर से गुहार लगाई है

काम के दौरान गई थी पति की जान

जानकारी के अनुसार, भोलियावास निवासी नरेन्द्र कुमार माली पेशे से मजदूर थे और मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। बीते 8 अप्रैल 2026 को काम के दौरान करंट लगने से एक दर्दनाक हादसे में उनकी मौत हो गई। नरेन्द्र कुमार मध्य प्रदेश सरकार की ‘मुख्यमंत्री जनकल्याण (संबल) योजना 2018’ के तहत पंजीकृत श्रमिक थे। घर के एकमात्र कमाने वाले सदस्य की मौत के बाद, पत्नी सपना माली और दो छोटे बच्चों के सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट खड़ा हो गया।

पंचायत की बेरुखी, आवेदन तक नहीं लिया

पीड़ित पत्नी सपना माली का आरोप है कि पति की आकस्मिक मौत के बाद वह संबल योजना की अनुग्रह राशि और अंत्येष्टि सहायता के लिए अपनी ग्राम पंचायत पहुंची थी। लेकिन, पंचायत स्तर पर जिम्मेदारों ने न तो उसकी कोई मदद की और न ही उसका आवेदन स्वीकार किया। चार महीने तक सिस्टम की बेरुखी और आर्थिक तंगी झेलने के बाद, आखिरकार सपना माली ने न्याय की आस में अपने नाबालिग बच्चों के साथ नीमच कलेक्टर कार्यालय का दरवाजा खटखटाया है।

पंजीयन क्रमांक के साथ मांगा अपना हक

कलेक्टर को सौंपे गए आवेदन में सपना माली ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि उनके स्वर्गीय पति का संबल योजना के तहत पंजीयन क्रमांक 118918093 है। उन्होंने प्रशासन से गुहार लगाई है कि नियमों के तहत उन्हें जल्द से जल्द योजना की सहायता राशि और अंत्येष्टि सहायता दिलाई जाए, ताकि वे अपने अनाथ बच्चों का पेट पाल सकें।

सिस्टम पर खड़े होते सवाल

यह पूरी घटना प्रशासनिक व्यवस्था और जमीनी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
जिस श्रमिक परिवार के लिए सरकार ने विशेष रूप से सामाजिक सुरक्षा की योजना बनाई, उसी परिवार को लाभ लेने के लिए चार महीने बाद कलेक्टर कार्यालय तक क्यों पहुंचना पड़ा?  अब देखना यह है कि कलेक्टर के संज्ञान में मामला आने के बाद सपना माली और उनके बच्चों को ‘संबल’ मिलने में और कितना वक्त लगता है, या उन्हें आगे भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे।

Atul Saxena
लेखक के बारे में
पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena
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