आप अपने बच्चे को जो बिस्किट, चिप्स या चॉकलेट खिला रहे हैं, क्या वो वाकई सुरक्षित है? राजस्थान के फूड सेफ्टी विभाग की हालिया रिपोर्ट तो कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। प्रदेश भर में चलाए गए ‘ईट राइट ड्राइव’ अभियान के नतीजे चौंकाने वाले हैं। जांच के लिए उठाए गए हर 10 में से एक से ज़्यादा फूड प्रोडक्ट या तो मिलावटी, घटिया या सेहत के लिए खतरनाक पाया गया है।

फूड सेफ्टी एंड ड्रग कंट्रोलर कमिश्नरेट ने दिसंबर में यह अभियान चलाया था। मकसद था यह जानना कि बाज़ार में बिक रही खाने-पीने की चीजें, खासकर जो बच्चों को टारगेट करती हैं, वो तय मानकों पर खरी उतरती हैं या नहीं। टीमों ने पूरे प्रदेश से बिस्किट, केक, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक, चिप्स, चॉकलेट, नूडल्स से लेकर समोसे-कचौरी तक के 670 सैंपल उठाए थे।

जब ये सैंपल अजमेर, जयपुर, जोधपुर समेत 9 लैब्स में जांचे गए तो सच सामने आ गया। कुल 670 में से 75 सैंपल (11.19%) फेल हो गए।

सबसे ज़्यादा ज़हर स्ट्रीट फूड में

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि सबसे बुरा हाल रेडी-टू-ईट और स्ट्रीट फूड का है। इस कैटेगरी में लिए गए 41.3% सैंपल सीधे तौर पर फेल पाए गए। यानी सड़क किनारे या रेस्टोरेंट में मिलने वाले खाने पर भरोसा करना सबसे जोखिम भरा है। इसके बाद पेय पदार्थों (कोल्ड ड्रिंक्स, जूस) के 30.7% सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे। बेकरी प्रोडक्ट्स जैसे केक, पेस्ट्री और बिस्किट के भी 24% सैंपलों में गड़बड़ी मिली।

साफ शब्दों में कहें तो 75 सैंपल ऐसे थे, जिन्हें खाना सेहत से खिलवाड़ करने जैसा है। इनमें से 4.03% सैंपल घटिया क्वालिटी के थे, 2.68% मिसब्रांडेड (पैकेट पर गलत जानकारी) और 2.54% तो सीधे तौर पर असुरक्षित पाए गए।

रंगों का खेल, बच्चों की सेहत से खिलवाड़

फूड सेफ्टी कमिश्नर डॉ. टी. शुभमंगला ने बताया कि जांच में एक खतरनाक ट्रेंड सामने आया है। खाने की चीज़ों को आकर्षक बनाने के लिए सिंथेटिक रंगों का अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है। खासकर गहरे पीले और नारंगी रंग का उपयोग तय सीमा से कहीं ज़्यादा मिला, जो सीधे बच्चों के दिमाग और व्यवहार पर बुरा असर डाल सकता है।

कुछ सैंपलों में फैट की मात्रा कम मिली तो कहीं दूध की शुद्धता से समझौता किया गया था। कई पैकेटों पर यह तक नहीं लिखा था कि उसे सुरक्षित रखने के लिए क्या इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, एक राहत की बात यह रही कि छोटे बच्चों के लिए बनने वाले बेबी फूड और न्यूट्रास्यूटिकल्स के सभी सैंपल सुरक्षित पाए गए।

अगर जिलों की बात करें तो भरतपुर में सबसे ज़्यादा 29.41% सैंपल फेल हुए, जबकि कोटा के सैंपल सबसे सुरक्षित पाए गए। सवाल यह है कि इन 75 फेल सैंपलों के निर्माताओं और विक्रेताओं पर अब क्या कार्रवाई होगी?