उज्जैन एक बार फिर आस्था के रंग में रंगने जा रहा है। करीब 8 साल बाद ज्येष्ठ अधिकमास का शुभ संयोग बन रहा है, जिसकी शुरुआत 2 मई से होगी। इस विशेष महीने में हजारों श्रद्धालु देशभर से उज्जैन पहुंचेंगे, जिससे शहर में सिंहस्थ से पहले ही कुंभ जैसा माहौल देखने को मिलेगा।
यह सिर्फ एक धार्मिक समय नहीं, बल्कि लोगों की आस्था और विश्वास का बड़ा केंद्र है। हर तीन साल में आने वाला अधिकमास इस बार खास इसलिए है क्योंकि लंबे अंतराल के बाद यह संयोग बन रहा है और इसका असर पूरे शहर पर साफ दिखाई देगा।
ज्येष्ठ अधिकमास 2026 कब से कब तक रहेगा
पंचांग के अनुसार, इस बार ज्येष्ठ अधिकमास 2 मई से शुरू होकर 29 जून तक रहेगा। इस दौरान अलग-अलग धार्मिक कालखंड भी बनेंगे, जिनका अपना अलग महत्व होता है। इस पूरे समय में पूजा, दान, तीर्थ स्नान और भगवान की आराधना का विशेष महत्व होता है। लोग इस अवधि में अपने जीवन को बेहतर बनाने और पुण्य कमाने के लिए धार्मिक कार्यों में भाग लेते हैं।
उज्जैन में क्यों लगता है कुंभ जैसा माहौल
उज्जैन को धर्मनगरी कहा जाता है और यहां का हर पर्व खास होता है। अधिकमास के दौरान चौरासी महादेव, नौ नारायण और सप्त सागरों के दर्शन का विशेष महत्व होता है। इसी कारण देशभर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। हजारों की संख्या में लोग एक साथ दर्शन और पूजा के लिए आते हैं, जिससे पूरा शहर एक बड़े धार्मिक मेले जैसा दिखने लगता है।
क्या होता है अधिकमास
अधिकमास का अर्थ होता है अतिरिक्त महीना। यह तिथियों की घट-बढ़ के कारण बनता है और इसका खास महत्व होता है। यह समय भगवान विष्णु की आराधना के लिए सबसे उत्तम होता है। इस दौरान किए गए दान-पुण्य, पूजा और भजन का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।
तीर्थों की हालत चिंता का विषय
जहां एक तरफ श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने वाली है, वहीं दूसरी तरफ तीर्थ स्थलों की हालत चिंता बढ़ा रही है। सप्त सागरों की स्थिति खराब हो रही है और कई जगहों पर अतिक्रमण की समस्या भी सामने आ रही है। कुछ सागर सिकुड़ते जा रहे हैं और उनकी साफ-सफाई भी ठीक से नहीं हो रही है। ऐसे में आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
धार्मिक स्थलों का जीर्णोद्धार जरूरी
उज्जैन में नौ नारायण और भगवान विष्णु के कई प्राचीन मंदिर हैं, जिनका अपना अलग महत्व है। लेकिन इनमें से कई मंदिर जर्जर हालत में हैं और उन्हें सुधार की जरूरत है। इतने महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों की देखभाल जरूरी है, ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा मिल सके और इन स्थलों की पहचान बनी रहे।






