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प्रयागराज माघ मेला: 30 दिन में 21 करोड़ श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी, कई देशों की कुल आबादी से भी ज्यादा

Written by:Gaurav Sharma
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प्रयागराज में चल रहे माघ मेले ने आस्था का नया कीर्तिमान स्थापित किया है। माघी पूर्णिमा तक केवल 30 दिनों में 21 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने त्रिवेणी संगम में स्नान किया। यह संख्या रूस और जापान जैसे कई देशों की कुल आबादी से भी अधिक है, और अभी महाशिवरात्रि का स्नान पर्व बाकी है।
प्रयागराज माघ मेला: 30 दिन में 21 करोड़ श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी, कई देशों की कुल आबादी से भी ज्यादा

प्रयागराज: आस्था और एकता के प्रतीक माघ मेले ने इस वर्ष एक अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किया है, जिसने न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। मेला प्रशासन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, रविवार को माघी पूर्णिमा स्नान तक मेले के पहले 30 दिनों में ही 21 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगाई है।

यह संख्या अपने आप में अभूतपूर्व है और महाकुंभ-2025 को छोड़कर देश के किसी भी धार्मिक या सामाजिक आयोजन में जुटने वाली भीड़ से कहीं ज्यादा है। मेले में अभी 14 दिन और महाशिवरात्रि का अंतिम प्रमुख स्नान पर्व शेष है, जिससे इस आंकड़े के और भी बढ़ने की पूरी संभावना है।

कई देशों की कुल आबादी से भी बड़ी संख्या

माघ मेले में जुटी श्रद्धालुओं की यह विशाल संख्या दुनिया के कई बड़े देशों की कुल आबादी को भी पीछे छोड़ देती है। मेला प्रशासन के अनुसार, यह आंकड़ा रूस, जापान, फ्रांस, नेपाल, श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे दर्जनों देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक है।

यह उत्तर प्रदेश की अपनी कुल आबादी का लगभग 80 प्रतिशत है, जो इस आयोजन के विराट स्वरूप को दर्शाता है। यह केवल एक धार्मिक समागम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों को एक सूत्र में पिरोने वाला एक अनूठा आयोजन साबित हुआ है।

देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु

इस ऐतिहासिक आयोजन का हिस्सा बनने के लिए सिर्फ उत्तर प्रदेश से ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने और विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचे। मेला प्रशासन ने इस विशाल भीड़ के प्रबंधन के लिए व्यापक इंतजाम किए थे, ताकि सभी श्रद्धालु सुरक्षित रूप से स्नान और दर्शन कर सकें।

महाशिवरात्रि के अंतिम स्नान पर्व के साथ इस संख्या के और बढ़ने का अनुमान है, जो माघ मेले को भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति के एक अद्वितीय प्रतीक के रूप में स्थापित करेगा।

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