ईरान से भारत पहुंचे हैं ये स्वादिष्ट पकवान, जानें कैसे बनें भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा

ईरान और भारत दोनों ऐसे देश हैं जिनकी पाककला में काफी समानता देखन को मिलती है। यहां व्यंजनों को तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले इनग्रेडिएंट भी एक जैसे हैं। चलिए आज हम आपको उन भारतीय व्यंजनों के बारे में बताते हैं जो ईरान से जुड़े हुए हैं।
Indian Dishes

इस समय ईरान की हर जगह चर्चा हो रही है क्योंकि इजराइल से ईरान का झगड़ा चल रहा है चल रहा है। इसी बीच क्या आप यह जानते हैं कि भारत और ईरान का रिश्ता सदियों पुराना है। एक नहीं बल्कि अनेक ऐसी चीज है जो इन दोनों देशों को एक दूसरे से जोड़ने का काम करती है। केवल चीजों का आयात निर्यात ही नहीं बल्कि कुछ व्यंजन भी है जो इन दोनों देशों को एक दूसरे से जोड़ने का काम करते हैं।

कोई भी देश अपने पर्यटक स्थलों और अन्य खासियतों के अलावा अपनी पाककला और स्वादिष्ट व्यंजनों की वजह से पहचाना जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि कई ऐसे भारतीय व्यंजन है, जो ईरान से निकले हैं। ये छोटे-छोटे बदलावों के बाद भारत पहुंचे हैं और अब भारत का हिस्सा बन चुके हैं। कुछ व्यंजन तो ऐसे हैं जिनका नाम सुनकर आप हैरान हो जाएंगे। चलिए आज हम आपको इन्हीं के बारे में बताते हैं और यह भी जान लेते हैं कि आखिरकार यह भारत कैसे पहुंच गए।

समोसा

पहले ही व्यंजन का नाम सुनकर आपको झटका जरूर लगा होगा। समोसा तो एक ऐसा व्यंजन है जो हर भारतीय नाश्ते के तौर पर जरूर खाता है। यह कुछ लोगों की डेली रूटीन में शामिल है। आपको बता दे की समोसे की उत्पत्ति दसवीं सदी के मध्य ईरान में की गई थी। वहां पर इसे संबोसा कहा जाता था। पहले यह आकार में छोटे हुए करते थे और यात्रियों के बीच काफी प्रसिद्ध थे। इसे कहीं भी रख कर ले जाया जा सकता था और चलते-फिरते खा सकते थे। यह व्यंजन आप भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।

बिरयानी

यह तो एक ऐसा व्यंजन है जो सबसे मशहूर भारतीय डिशेज में से एक है। इसे खाने वालों की संख्या की कोई कमी नहीं है। भारतीय लोगों के लिए बिरयानी केवल एक दिशा नहीं बल्कि संस्कृति और इतिहास से जुड़ी हुई महत्वपूर्ण चीज है। इतिहासकारों के मुताबिक बिरयानी शब्द ईरानी भाषा से जुड़ा हुआ है। इसका अर्थ फ्राई किया हुआ चावल होता है। भारत से पहले चावल को सब्जियों और मांस के साथ पकाने की प्रक्रिया पहले ईरान और मध्य एशिया में प्रचलित थी। जब मुगल भारत आए तो अपने साथ चावल की इस डिश को भी लेकर आए। इसे अलग-अलग तकनीक से बनाए जाने लगा और यह भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गई।

फालूदा

फालूदा एक ऐसा व्यंजन है कैसी लोग गर्मियों में बड़े चाव के साथ खाते हैं। इसकी शुरुआत ईरान से भी लेकिन बनाने की तकनीक चीन से हुई थी। आज से करीब 4000 साल पहले जब फ्रिज नहीं हुआ करते थे तब भी चीन में लोग फ्रोजन डिश का आनंद लेते थे। इसके लिए वो बर्फ को जमाने के लिए पोटेशियम नाइट्रेट का इस्तेमाल किया करते थे। व्यापार के जरिए यह तकनीक ईरान पहुंची। ईरान में इसके साथ नया प्रयोग किया गया। सवैया और गुलाब जल को मिलाकर एक व्यंजन बनाया गया जिसे फालूदेह नाम मिला। भारत में मुगल काल के दौरान इसकी एंट्री हुई और यह मुख्य रसोई में शामिल कर दिया गया।

Diksha Bhanupriy
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Diksha Bhanupriy

10 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव, डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में.

"पत्रकारिता का मुख्य काम है, लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को संदर्भ के साथ इस तरह रखना कि हम उसका इस्तेमाल मनुष्य की स्थिति सुधारने में कर सकें।” इसी उद्देश्य के साथ मैं पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रही हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है। मैं कॉपी राइटिंग, वेब कॉन्टेंट राइटिंग करना जानती हूं। मेरे पसंदीदा विषय दैनिक अपडेट, मनोरंजन और जीवनशैली समेत अन्य विषयों से संबंधित है। View all posts by Diksha Bhanupriy →
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