मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने विजयादशमी के अवसर पर भोपाल स्थित अपने निवास पर विधिविधान से शस्त्र पूजन किया। उन्होंने विजयादशमी को मर्यादा, साहस, सत्य और शौर्य का प्रतीक बताते हुए प्रदेश और देशवासियों को पर्व की शुभकामनाएं दीं। मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि “यतो धर्मस्ततो जयः” अर्थात जहां धर्म है, वहीं विजय है।
मुख्यमंत्री ने प्रभु श्रीराम से मध्यप्रदेश में सुशासन, विकास और समृद्धि की निरंतरता तथा जनकल्याण के संकल्पों की सिद्धि की कामना की। उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम जी की कृपा से अपना मध्यप्रदेश सुशासन, विकास और समृद्धि के पथ पर निरंतर अग्रसर रहे और जनकल्याण के सभी संकल्प सिद्ध हों।
ये भी पढ़ें
भगवान श्रीराम की रावण पर विजय
भारतीय परंपरा में विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व माना जाता है। शस्त्र पूजन की परंपरा के पीछे भगवान श्रीराम, मां दुर्गा और प्राचीन भारतीय युद्ध परंपराओं से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं हैं। रामायण की मान्यता के अनुसार, विजयादशमी के दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया था। इस घटना को अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में देखा जाता है। शस्त्र पूजन को इसी विजय की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि शस्त्र शक्ति का प्रतीक हैं और उनका उपयोग धर्म, न्याय तथा दूसरों की रक्षा के लिए किया जाना चाहिए।
मां दुर्गा और महिषासुर की कथा
शस्त्र पूजन की एक अन्य प्रमुख धार्मिक मान्यता मां दुर्गा और महिषासुर के युद्ध से जुड़ी है। देवी महात्म्य की कथा के अनुसार, महिषासुर के अत्याचारों से देवताओं को मुक्ति दिलाने के लिए देवी दुर्गा ने उससे युद्ध किया और उसका वध किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवताओं ने देवी को विभिन्न अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए थे। देवी दुर्गा के हाथों में मौजूद त्रिशूल, तलवार, धनुष और अन्य आयुध बुराई का सामना करने वाली शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। विजयादशमी पर शस्त्र पूजन को शक्ति और धर्म की इसी विजय से जोड़कर देखा जाता है।
महाभारत में पांडवों और शमी वृक्ष की कथा
शस्त्र पूजन से जुड़ी मान्यता महाभारत के विराट पर्व की कथा है। इसके अनुसार, अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष में छिपा दिए थे। अज्ञातवास की अवधि पूरी होने पर अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने शस्त्र वापस निकाले और राजा विराट की गायों की रक्षा के लिए कौरवों की सेना का सामना किया। परंपरा में इस प्रसंग को विजयादशमी पर शस्त्र पूजन और शमी वृक्ष की पूजा से जोड़ा जाता है। शस्त्रों को वापस प्राप्त कर अर्जुन की विजय की कथा इस विश्वास को बल देती है कि यह दिन साहस, पराक्रम और विजय के संकल्प का प्रतीक है।
राजा और योद्धा करते थे शस्त्र पूजन
प्राचीन भारतीय परंपरा में युद्ध पर जाने से पहले राजा और योद्धा अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करते थे। शस्त्र उनकी शक्ति के साथ-साथ राज्य की रक्षा और प्रजा के प्रति उनके कर्तव्य का भी प्रतीक थे। विजयादशमी को विजय का पर्व माने जाने के कारण इस दिन शस्त्र पूजन की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित हुई। समय के साथ यह परंपरा सैन्य और राजपरिवारों से आगे बढ़कर विभिन्न समुदायों तक पहुंची। आज भी कई स्थानों पर सैनिक, पुलिसकर्मी और पारंपरिक शस्त्रविद्या से जुड़े लोग विजयादशमी पर शस्त्र पूजन करते हैं।
