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MP वन विभाग में डिप्टी रेंजर की बहाली पर विवाद, नर्मदापुरम के बर्खास्तगी मामले में भोपाल से पुनरावलोकन की मांग

Written by:Banshika Sharma
Published:
नर्मदापुरम वन वृत्त के एक चर्चित मामले में बर्खास्त डिप्टी रेंजर को मिली राहत पर सवाल उठ गए हैं। वरिष्ठ अधिकारियों के परस्पर विरोधी आदेशों का हवाला देते हुए, अपीलीय आदेश के खिलाफ वन बल प्रमुख से पुनरावलोकन की मांग की गई है, जिससे विभाग में हलचल तेज हो गई है।
MP वन विभाग में डिप्टी रेंजर की बहाली पर विवाद, नर्मदापुरम के बर्खास्तगी मामले में भोपाल से पुनरावलोकन की मांग

मध्य प्रदेश वन विभाग में एक डिप्टी रेंजर की बर्खास्तगी और फिर बहाली का मामला एक बार फिर तूल पकड़ता दिख रहा है। नर्मदापुरम वन वृत्त के एक पुराने मामले में सेवा से बर्खास्त किए गए डिप्टी रेंजर को अपीलीय स्तर पर दी गई राहत के खिलाफ अब विभाग के शीर्ष स्तर पर पुनरावलोकन (Review) की मांग की गई है। इस कदम ने वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों की वैधता और विभागीय प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला साल 2019 में हुए एक विभागीय भ्रमण से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं का है। इस प्रकरण में चली लंबी विभागीय जांच के बाद तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक, नर्मदापुरम ने 30 जून 2025 को आदेश जारी कर डिप्टी रेंजर हरगोविंद मिश्रा को सेवा से बर्खास्त कर दिया था। हालांकि, बाद में इस आदेश के खिलाफ की गई अपील पर उन्हें राहत मिल गई और बर्खास्तगी का आदेश निरस्त कर दिया गया था।

विरोधी आदेशों से भ्रम की स्थिति

अब इस बहाली के आदेश के खिलाफ वन बल प्रमुख एवं प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF), भोपाल को एक पत्र लिखकर पूरे मामले की समीक्षा की मांग की गई है। आवेदन में कहा गया है कि एक ही प्रकरण में वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा पारित परस्पर विरोधी निर्णय विभागीय व्यवस्था में भ्रम पैदा कर रहे हैं। जिस मामले में गहन जांच के बाद बर्खास्तगी जैसा कठोर कदम उठाया गया, उसे अपीलीय स्तर पर पूरी तरह निरस्त कर देना प्रशासनिक दृष्टि से पुन: परीक्षण के योग्य है।

वित्तीय नियमों के उल्लंघन का आरोप

पुनरावलोकन आवेदन में वित्तीय नियमों को लेकर भी गंभीर आपत्ति जताई गई है। इसमें कहा गया है कि जिस विभागीय भ्रमण को लेकर यह पूरा विवाद खड़ा हुआ, उसकी शासकीय स्वीकृति और राशि का आवंटन भ्रमण की तारीख के बाद हुआ था। ऐसे में सवाल उठाया गया है कि क्या स्वीकृति से पहले निजी या उधार की राशि से शासकीय कार्य कराना नियमों के तहत सही है?

पत्र में यह भी रेखांकित किया गया है कि विभागीय नियम किसी भी अधीनस्थ अधिकारी को व्यक्तिगत राशि से शासकीय भुगतान करने का अधिकार नहीं देते। साथ ही, शासन द्वारा नकद भुगतान पर पहले से ही प्रतिबंध है। इन तथ्यों के बावजूद ऐसे भुगतानों को सही मानते हुए अपीलीय आदेश पारित करना वित्तीय नियमों की मूल भावना के खिलाफ बताया गया है।

गौरतलब है कि 30 जून 2025 को बर्खास्तगी के बाद डिप्टी रेंजर ने अपील की थी, जिस पर 15 जनवरी 2026 को आदेश पारित करते हुए उन्हें बहाल कर दिया गया था। अब इस बहाली के आदेश पर पुनरावलोकन की मांग उठने के बाद विभागीय गलियारों में हलचल तेज हो गई है और सभी की निगाहें भोपाल मुख्यालय पर टिक गई हैं कि इस मामले में आगे क्या कदम उठाया जाता है।