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विश्व पुस्तक दिवस: ज्ञान और विचारों के उत्सव का दिन, सीएम डॉ. मोहन यादव ने दिया किताबों के संसार से जुड़ने का संदेश

Written by:Shruty Kushwaha
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पुस्तकें हमें जीवन को समझने की दृष्टि देती हैं, हमारे भीतर नई कल्पनाओं को जन्म देती हैं और बौद्धिक रूप से समृद्ध बनाती हैं। समय के साथ तकनीक का विकास भले ही जीवन को सरल और तेज़ बना रहा हो, लेकिन इसके प्रभाव से पुस्तकों के प्रति लोगों का रुझान कुछ कम हुआ है। पाठ्य पुस्तकों के अलावा सामान्य पढ़ने की आदत भी धीरे-धीरे घटती नजर आ रही है। लेकिन हमें फिर से पुस्तकों से अपना नाता जोड़ना होगा क्योंकि उनके जैसा सशक्त और स्थायी विकल्प आज भी कोई नहीं है।
विश्व पुस्तक दिवस: ज्ञान और विचारों के उत्सव का दिन, सीएम डॉ. मोहन यादव ने दिया किताबों के संसार से जुड़ने का संदेश

World Book Day

आज दुनियाभर में ‘विश्व पुस्तक दिवस’ (World Book Day) मनाया जा रहा है। इसे ‘विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस’ के रूप में भी जाना जाता है। पुस्तकें सिर्फ कागज़ पर छपे शब्द नहीं होतीं बल्कि वे अनुभवों, विचारों और ज्ञान का जीवंत संसार होती हैं। एक अच्छी पुस्तक हमें उन जगहों की सैर कराती हैं जहां हम वास्तव में कभी गए नहीं। उन लोगों से मिलवाती है जिन्हें हमने कभी देखा नहीं। और ऐसे विचारों से परिचित कराती है जो हमारी सोच को नया आयाम देते हैं।

इस दिन को मनाने का उद्देश्य पुस्तकों के महत्व को रेखांकित करना, पढ़ने की आदत को बढ़ावा देना और लेखकों, प्रकाशकों तथा साहित्यकारों के योगदान का सम्मान करना है। इस अवसर पर सीएम डॉ मोहन यादव ने पुस्तकों के महत्व का उल्लेख करते हुए सभी को शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि “पुस्तकें सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि अनुभव और प्रेरणा का अनमोल खजाना हैं। आइये, पुस्तकों के संसार से जुड़ें, निरंतर सीखें और वैचारिक समृद्धि के पथ पर आगे बढ़ें।”

विश्व पुस्तक दिवस का इतिहास 

यूनेस्को के नेतृत्व में मनाया जाने वाला “विश्व पुस्तक दिवस” साहित्य की शक्ति, लेखकों के योगदान और पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। इस दिन की शुरुआत का संबंध स्पेन से माना जाता है। स्पेनिश प्रकाशक विसेंट क्लेवेल एन्ड्रेस के सुझाव पर पहली बार 1926 में स्पेन में पुस्तक दिवस मनाया गया। हालांकि, शुरुआत में यह लेखक मिगेल दे सर्वांतेस के जन्मदिन 7 अक्टूबर को मनाया जाता था, लेकिन 1930 से इसे उनकी पुण्यतिथि यानी 23 अप्रैल को मनाया जाने लगा।

यह तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि 23 अप्रैल 1616 का दिन विश्व साहित्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी दिन को महान लेखक मिगेल दे सर्वांतेस, विलियम शेक्सपियर और इंका गार्सिलासो दे ला वेगा का निधन हुआ था।  आगे चलकर, 1995 में पेरिस में आयोजित यूनेस्को की आम सभा ने दुनिया भर के पाठकों, लेखकों और प्रकाशकों को सम्मानित करने के लिए 23 अप्रैल को “विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस” के रूप में आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्रदान की। तब से हर साल दुनिया भर के 100 से अधिक देशों में यह उत्सव मनाया जाता है।

इस दिन का उद्देश्य

विश्व पुस्तक दिवस का प्रमुख उद्देश्य समाज में पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित करना, ज्ञान के प्रसार को बढ़ावा देना और  कॉपीराइट जैसे बौद्धिक अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना है। पुस्तकें सिर्फ ज्ञान का साधन नहीं हैं बल्कि यह व्यक्तित्व विकास, कल्पनाशीलता और आलोचनात्मक सोच को भी मजबूत करती हैं। डिजिटल युग में भी पुस्तकों का महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि शिक्षा और मानसिक विकास में उनकी भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

विश्व पुस्तक दिवस का महत्व

पुस्तकें मनुष्य की सबसे सच्ची मित्र मानी जाती हैं क्योंकि वे बिना किसी अपेक्षा के हमें ज्ञान देती हैं, हमारा मार्गदर्शन करती हैं और कठिन समय में हमेशा साथ निभाती हैं। जब जीवन में उलझनें बढ़ती हैं तब एक अच्छी पुस्तक ही होती है जो हमें शांत करती है, सोचने की दिशा देती है और हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को जगाती है। ज्ञान, संस्कृति और सभ्यता का सबसे मजबूत आधार भी पुस्तकें ही हैं। इन्हीं के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी अनुभव और परंपराएं आगे बढ़ती हैं। पुस्तकें सिर्फ जानकारी नहीं देतीं, बल्कि हमें संवेदनशील, समझदार और विचारशील इंसान बनाती हैं। इसीलिए पुस्तकों को अपने जीवन में शामिल करना चाहिए क्योंकि अच्छी पुस्तकों के माध्यम से हम एक बेहतर मनुष्य बन सकते हैं।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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