बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही सियासी हलचल तेज हो गई है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक और चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (पीके) ने अपने अगले कदम का संकेत दे दिया है। उन्होंने साफ कहा कि अगर वे चुनाव लड़ेंगे तो दो सीटों में से किसी एक से लड़ेंगे – करगहर (रोहतास) या राघोपुर (वैशाली)। करगहर उनकी जन्मभूमि है, जबकि राघोपुर को वे अपनी कर्मभूमि बताते हैं। दिलचस्प बात यह है कि राघोपुर सीट राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का गढ़ है। ऐसे में पीके का चुनावी मैदान में उतरना मुकाबले को बेहद रोचक बना सकता है।


करगहर: पीके की जन्मभूमि और ब्राह्मण बहुल इलाका

करगहर विधानसभा क्षेत्र रोहतास जिले में आता है और यहां का जातीय समीकरण खास मायने रखता है। यह सीट ब्राह्मण बहुल मानी जाती है और मौजूदा विधायक कांग्रेस के संतोष मिश्रा भी ब्राह्मण समुदाय से हैं। प्रशांत किशोर का जन्म भी यहीं हुआ था और वे इसी समाज से आते हैं। हालांकि, करगहर का गणित केवल ब्राह्मणों तक सीमित नहीं है। यहां कुर्मी, कोइरी और अनुसूचित जाति के मतदाता भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। पीके की दावेदारी से यह साफ है कि वे ब्राह्मण वोट बैंक को आकर्षित करने के साथ-साथ अन्य समुदायों को भी अपने पक्ष में लाने की कोशिश करेंगे।


करगहर के चुनावी नतीजों का इतिहास

करगहर सीट पर अब तक का इतिहास भी दिलचस्प रहा है। साल 2010 में जनता दल के रामधनी सिंह यहां से विजयी हुए। इसके बाद 2015 के चुनाव में जनता दल के ही वशिष्ठ सिंह ने जीत दर्ज की। लेकिन 2020 में कांग्रेस ने वापसी की और ब्राह्मण नेता संतोष मिश्रा विधायक बने। इस तरह तीन अलग-अलग दलों का प्रतिनिधित्व कर चुकी यह सीट सियासी रूप से हमेशा उतार-चढ़ाव वाली रही है। प्रशांत किशोर अगर यहां से उतरते हैं तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है और कांग्रेस के साथ-साथ एनडीए और महागठबंधन की रणनीतियों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।


राघोपुर: लालू परिवार का गढ़ और पीके की चुनौती

राघोपुर सीट पर यादव वोटरों का दबदबा है। यहां से अब तक लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव जैसे दिग्गज नेता जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। केवल साल 2010 को छोड़ दें, तो बाकी हर चुनाव में लालू परिवार का कब्जा रहा है। 2010 में जेडीयू के सतीश यादव ने जीत दर्ज कर इतिहास बनाया था, लेकिन 2015 और 2020 में तेजस्वी यादव ने सीट वापस हासिल कर ली। प्रशांत किशोर पहले भी कह चुके हैं कि अगर वे चुनाव लड़ेंगे तो तेजस्वी यादव के खिलाफ ही उतरेंगे। ऐसे में राघोपुर से उनका चुनाव लड़ना सीधे लालू परिवार को चुनौती देने जैसा होगा।


मुकाबले को बनाएगा कड़ा दोनों सीटों पर पीके का उतरना

वर्तमान में करगहर सीट कांग्रेस के पास है और राघोपुर आरजेडी के कब्जे में है। यानी दोनों ही सीटें महागठबंधन के प्रभाव वाले इलाके हैं। ऐसे में अगर प्रशांत किशोर इनमें से किसी एक से चुनाव लड़ते हैं तो मुकाबला बेहद कड़ा हो जाएगा। करगहर में ब्राह्मण और अन्य जातीय समीकरण उनके लिए अवसर बन सकते हैं, जबकि राघोपुर में वे सीधा लालू परिवार को टक्कर देंगे। पीके का चुनावी मैदान में उतरना न केवल महागठबंधन, बल्कि एनडीए और अन्य दलों की रणनीति को भी पूरी तरह बदल सकता है। यही वजह है कि उनके बयान ने बिहार की सियासत में हलचल मचा दी है।