बिहार में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री और दोनों डिप्टी सीएम को एक सीधी और सार्वजनिक चुनौती दी है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से एनडीए सरकार पर जोरदार हमला बोला है। तेजस्वी यादव का कहना है कि अगर मुख्यमंत्री या उनके दोनों उपमुख्यमंत्रियों में “नैतिक साहस और योग्यता” है, तो वे बिहार के मौजूदा विकास आंकड़ों और तथ्यों पर उनसे सार्वजनिक बहस करें। यह चुनौती ऐसे समय में आई है जब बिहार के विकास मॉडल को लेकर राजनीतिक गलियारों में लगातार बहस छिड़ी हुई है।
तेजस्वी यादव ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा है कि, “21 वर्षों की एनडीए सरकार और 12 वर्षों की डबल इंजन सरकार के कर कमलों से विगत दो दशकों से शिक्षा, रोजगार, आय, औद्योगिक विकास, उत्पादन व निवेश, तथा स्वास्थ्य सेवा, सुविधा और पोषण से लेकर अधिकांश सामाजिक, मानवीय और आर्थिक संकेतकों में बिहार सबसे निचले पायदानों पर है।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राज्य की इस दयनीय स्थिति के लिए वर्तमान सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं। तेजस्वी ने आरोप लगाया कि जब कोई बिहार को सबसे पिछड़ा और गरीब राज्य बताता है, तो “भ्रष्ट शासकों” को यह बात अपमानजनक लगती है। उनके मुताबिक, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये आंकड़े और तथ्य “इनके सफेद झूठ व अपार असफलता का पर्दाफाश कर इनकी सच्चाई को उजागर करता है” और यही कारण है कि एनडीए के नेताओं को यह “असहनीय दर्द-पीड़ा” महसूस होती है। तेजस्वी का यह बयान राज्य में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप की नई कड़ी जोड़ता है।
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बिहार के विकास पर तेजस्वी के सवाल और आंकड़े
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने स्पष्ट कहा कि बिहार की यह स्थिति पिछले 21 वर्षों से बनी हुई है। उन्होंने सरकार को “निर्लज्ज, नाकाम, नकारा और निक्कमी” बताते हुए कहा कि यह सरकार हर बात में विपक्ष पर दोषारोपण कर अपनी “राजक नीतियों, सफेद झूठ और खोखले दावों के बोझ तले अपनी आसमानी विफलता को छुपाने का असफल प्रयास करती है।” उन्होंने अपनी चुनौती को दोहराते हुए कहा कि अगर मुख्यमंत्री और दोनों उपमुख्यमंत्रियों में “नैतिक साहस और योग्यता” है, तो बिहार की प्रगति और बेहतरी के लिए “इस यथार्थ और सरकार के अपने ही आंकड़ों व तथ्यों पर” उनसे जब चाहे, जहां चाहे, जैसे चाहे सार्वजनिक बहस कर सकते हैं। इसके बाद उन्होंने विस्तार से उन तथ्यों और आंकड़ों को सामने रखा, जिनके आधार पर वे सरकार को घेर रहे हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में फिसड्डी: तेजस्वी यादव के अनुसार, देश में सबसे कम साक्षरता दर बिहार में है। स्कूल ड्रॉप आउट रेट यानी बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की दर भी बिहार में सबसे अधिक है, जो शिक्षा प्रणाली की कमजोरी को दर्शाता है। प्यूपिल-टीचर रेशियो भी देश में सबसे खराब बिहार का है, यानी प्रति शिक्षक छात्रों की संख्या बहुत अधिक है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मामले में बिहार देश में सबसे पीछे है, और प्रति एक लाख आबादी पर कॉलेजों की संख्या भी सबसे कम बिहार में ही है। ये आंकड़े राज्य में उच्च शिक्षा और बुनियादी साक्षरता दोनों की चिंताजनक स्थिति को उजागर करते हैं।
आर्थिक मोर्चे पर पिछड़ता बिहार: आर्थिक संकेतकों पर बात करते हुए तेजस्वी ने कहा कि देश में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय बिहार की है, जो राज्य के नागरिकों की आर्थिक स्थिति को दर्शाता है। किसानों की आय भी देश में सबसे कम बिहार में ही है, जो कृषि प्रधान राज्य के लिए एक गंभीर चुनौती है। प्रति व्यक्ति निवेश और प्रति व्यक्ति उपभोग के मामले में भी बिहार देश में सबसे नीचे है। ग्रामीण आय और प्रति व्यक्ति बिजली खपत भी देश में सबसे कम बिहार की ही है। किसानों को मिलने वाले कृषि ऋण, विशेषकर केसीसी लोन के अंतर्गत, भी देश में सबसे कम बिहार में मिलता है। ये सभी आंकड़े बिहार की आर्थिक धीमी गति और लोगों की क्रय शक्ति की कमी को दर्शाते हैं।
बेरोजगारी और पलायन का दंश: तेजस्वी यादव ने बताया कि देश में सबसे अधिक बेरोजगारी बिहार में है। ग्रामीण युवा बेरोजगारों की संख्या भी बिहार में सबसे अधिक है, जो कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डालती है। शहरी बेरोजगार युवा भी बिहार के ही सबसे अधिक हैं, जिससे शहरों में भी रोजगार के अवसरों की कमी साफ दिखती है। इन कारणों से देश में सबसे अधिक पलायन बिहार से होता है, जहां लोग रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर हैं।
अपराध और सुरक्षा की चुनौती: आंकड़ों के मुताबिक, देश में सबसे अधिक अपराध बिहार में है। हिंसक अपराध और अपहरण के मामले में भी बिहार देश में सबसे ऊपर है, जो राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्वास्थ्य और पोषण की गंभीर स्थिति: नीति आयोग के सतत विकास के लक्ष्य और विकास के तमाम सूचकांकों में बिहार सबसे नीचे है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में, देश में सबसे अधिक कम वजन के बच्चे बिहार में हैं। सबसे अधिक बौने बच्चे और खून की कमी से पीड़ित महिलाएं भी बिहार में ही हैं, जो कुपोषण की व्यापकता को दर्शाता है। मल्टी डाइमेंशनल पॉवर्टी यानी बहुआयामी गरीबी भी बिहार में सबसे अधिक है, जिसका अर्थ है कि लोग एक साथ कई तरह की वंचितताओं का सामना कर रहे हैं। डॉक्टरों के पद भी देश में सबसे अधिक बिहार में रिक्त हैं, लगभग 58% पद खाली हैं, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो रही हैं।
बुनियादी सुविधाओं और औद्योगिक विकास में पिछड़ापन: पर्यावरण के मोर्चे पर, भारत के 50 सबसे प्रदूषित शहरों में सबसे अधिक शहर बिहार के हैं। आवास के मामले में, देश में सबसे अधिक झोपड़ी में रहने वाले लोग बिहार के हैं, जहां की 14% आबादी अभी भी झोपड़ियों में रहती है। आधुनिक सुविधाओं और सेवाओं में भी बिहार देश में सबसे पीछे है। औद्योगीकरण, औद्योगिक विकास-उत्पादन और निवेश में भी बिहार सबसे फिसड्डी है, जिससे राज्य में नए रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो पा रहे हैं।
इन तमाम आंकड़ों को पेश करने के बाद, तेजस्वी यादव ने सरकार से गंभीरता से आत्मचिंतन करने को कहा। उन्होंने पूछा कि “21 वर्षों के शासन बाद भी बिहार विकास के इन सभी संकेतकों में राष्ट्रीय औसत से अत्यधिक कम क्यों है?” उन्होंने कहा कि जब तक समस्या को सही ढंग से पहचाना नहीं जाएगा और उसके समाधान पर काम नहीं किया जाएगा, तब तक सरकार को अपनी “असफलता छुपाने के लिए हर बार ऐसे ही चुनावों में चुनाव आयोग जैसी संस्था, भ्रष्ट अधिकारियों की चौकड़ी, सरकारी तंत्र का दुरुपयोग और मदद, 10 हजार नगद और 1 करोड़ नौकरी व हर महिला को 2 लाख रुपए बांटने जैसे सफेद झूठ” बोलने पड़ेंगे। तेजस्वी की यह चुनौती आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में और गरमाहट ला सकती है।