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डबरा सिविल अस्पताल में बदहाली ने ली स्टाफ नर्स ज्योति बघेल की जान! ICU और एम्बुलेंस न होने से सिस्टम पर सवाल

Written by:Ankita Chourdia
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डबरा सिविल अस्पताल में ड्यूटी के दौरान स्टाफ नर्स ज्योति बघेल को हार्ट अटैक आया, लेकिन अस्पताल में जीवन रक्षक सुविधाओं के अभाव में उनकी मौत हो गई। इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग की लचर व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर कर दिया है।
डबरा सिविल अस्पताल में बदहाली ने ली स्टाफ नर्स ज्योति बघेल की जान! ICU और एम्बुलेंस न होने से सिस्टम पर सवाल

Dabra Civil Hospital staff nurse dies

मध्य प्रदेश के डबरा सिविल अस्पताल की जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं ने एक बार फिर पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अस्पताल में कार्यरत स्टाफ नर्स ज्योति बघेल के आकस्मिक निधन ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। यह मामला केवल एक स्वास्थ्य कर्मी की मौत का नहीं है, बल्कि उस सिस्टम की नाकामी का है जो आपात स्थिति में अपने ही स्टाफ को प्राथमिक उपचार तक उपलब्ध नहीं करा सका।

ड्यूटी के दौरान आया अटैक, रेफरल के दौरान तोड़ा दम

प्राप्त जानकारी के अनुसार, जच्चा खाने में पदस्थ स्टाफ नर्स ज्योति बघेल को ड्यूटी के दौरान अचानक कार्डियक अटैक आया। उस वक्त अस्पताल में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर डी एस सगर और एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉक्टर सुरेंद्र सोलंकी ने तत्काल मोर्चा संभाला और प्राथमिक उपचार कर उन्हें होश में लाने की कोशिश की। हालांकि, स्थिति इतनी गंभीर थी कि उन्हें तत्काल गहन चिकित्सा (ICU) की आवश्यकता थी।

डबरा सिविल अस्पताल में न तो ICU की व्यवस्था थी और न ही कोई कार्डियक एम्बुलेंस उपलब्ध थी। आवश्यक कार्डियक दवाओं की कमी के चलते डॉक्टरों के पास उन्हें ग्वालियर रेफर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। दुर्भाग्यवश, ग्वालियर ले जाते समय रास्ते में ही ज्योति बघेल ने दम तोड़ दिया। इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पर्याप्त सुविधाएं होने पर उनकी जान बचाई जा सकती थी?

केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गया है अस्पताल

स्थानीय नागरिकों और स्वास्थ्य कर्मियों में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है। आरोप है कि डबरा सिविल अस्पताल अब केवल एक रेफरल सेंटर बनकर रह गया है। यहाँ आकस्मिक चिकित्सा के नाम पर केवल उल्टी-दस्त जैसे सामान्य मामलों का उपचार किया जाता है। दुर्घटना, गोली लगने, जहर सेवन या कार्डियक अरेस्ट जैसे गंभीर मामलों में मरीजों को सीधे JAH ग्वालियर भेज दिया जाता है।

अस्पताल की इमरजेंसी यूनिट की हालत यह है कि यहाँ मात्र चार बिस्तर हैं, जहाँ अधिकांश समय केवल सलाइन बोतल चढ़ाने तक की सुविधा ही मिल पाती है। सूत्रों का दावा है कि आकस्मिक चिकित्सा विभाग में ऐसे कर्मचारियों की तैनाती की गई है, जिन्हें इंजेक्शन लगाने या टांके लगाने जैसे बुनियादी कार्यों का भी सही प्रशिक्षण नहीं है। गंभीर मरीजों का उपचार इन अप्रशिक्षित हाथों में होता है, जबकि विशेषज्ञ डॉक्टर केवल ओपीडी में पर्ची लिखने तक सीमित रहते हैं।

संसाधनों की बर्बादी: कबाड़ में तब्दील हुईं एम्बुलेंस

व्यवस्था की विडंबना देखिए कि डबरा में संसाधनों की कमी नहीं थी, बल्कि उनका रखरखाव और प्रबंधन शून्य है। कार्डियक मरीजों के लिए बिजली विभाग की एक कंपनी ने करीब 30 से 40 लाख रुपये की सर्वसुविधायुक्त एम्बुलेंस दान में दी थी। इसके अलावा विधायक सुरेश राजे ने भी एक एम्बुलेंस उपलब्ध कराई थी। लेकिन वर्तमान में ये दोनों ही गाड़ियां रखरखाव के अभाव में कबाड़ की तरह खड़ी हैं। अगर ये एम्बुलेंस चालू हालत में होतीं, तो शायद ज्योति बघेल को समय पर उचित चिकित्सा सहायता मिल सकती थी।

प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही पर सवाल

अस्पताल की कार्यशैली पर उठ रहे सवालों में सबसे प्रमुख MD मेडिसिन की अनुपस्थिति है। आरोप है कि विशेषज्ञ डॉक्टर अस्पताल में बमुश्किल ही नजर आते हैं। ओपीडी के समय में विशेषज्ञों की उपलब्धता न होने के कारण मरीजों को दंत चिकित्सक के पास भेजा जाता है। इसके अलावा, कई कर्मचारी डिजिटल हाजिरी लगाकर गायब रहते हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती।

अब स्थानीय लोग CBMO डबरा, CMHO ग्वालियर और जिला प्रशासन से इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि जब तक जिम्मेदार अधिकारियों और लापरवाह कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार संभव नहीं है। ज्योति बघेल की मौत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि डबरा की स्वास्थ्य व्यवस्था खुद ‘ICU’ में है और इसे तत्काल इलाज की जरूरत है।