ग्वालियर: करीब चार साल पहले भू-माफिया से मुक्त कराई गई 125 करोड़ रुपये की सरकारी जमीन का मामला अब अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में बढ़ गया है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने इस मामले में हुई प्रशासनिक देरी और लापरवाही पर सख्त नाराजगी जताते हुए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। इसके जवाब में राज्य शासन ने अदालत को बताया कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता ने हाईकोर्ट को सूचित किया कि राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव ने सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) को औपचारिक पत्र भेजकर दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। यह भी बताया गया कि GAD सचिव से इस विषय पर चर्चा हो चुकी है और उन्होंने आश्वासन दिया है कि प्रकरण को लंबित रखने वाले प्रभारी अधिकारियों (OICs) पर जल्द ही एक्शन लिया जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
यह प्रकरण ग्वालियर के दीनारपुर तहसील मुरार और गिरवाई क्षेत्र की लगभग 61 बीघा बेशकीमती सरकारी जमीन से जुड़ा है। जिला प्रशासन ने करीब चार साल पहले एंटी-माफिया अभियान के तहत यह कार्रवाई की थी।
- दीनारपुर: यहां सर्वे क्रमांक 376 से 411 तक की 45 बीघा 10 बिस्वा जमीन पर अवैध प्लॉटिंग, खेती और मकान बना लिए गए थे, जिन्हें प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया था।
- गिरवाई: जनकपुरी इलाके में 16 बीघा शासकीय मंदिर पेटे की भूमि पर बनी दुकानों और मकानों की नींव को भी गिराया गया था।
इस बड़ी कार्रवाई के बावजूद, जमीन का स्वामित्व और कब्जा लेने की प्रक्रिया विभागीय फाइलों और कानूनी दांव-पेंच में उलझकर रह गई।
सुप्रीम कोर्ट से लेकर कलेक्टर तक का आदेश
जमीन खाली कराने के बाद वर्ष 2017 में एक आवेदक ने इस भूमि पर अपना हक जताते हुए मुआवजे और कब्जे का दावा किया। यह मामला शासन स्तर से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने आवेदक के दावे को खारिज कर दिया। इसी आदेश के आधार पर बाद में ग्वालियर कलेक्टर न्यायालय ने दीनारपुर की पूरी 45 बीघा 10 बिस्वा भूमि को शासकीय घोषित कर दिया। कलेक्टर ने संबंधित तहसीलदार और एसडीएम को जमीन पर शासन हित में कब्जा लेने और इसे खुर्द-बुर्द होने से बचाने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी सौंपी थी।
लापरवाही पर हाईकोर्ट की सख्ती
कलेक्टर के स्पष्ट आदेश के बावजूद वर्षों तक प्रभावी कार्रवाई न होने और मामले को लटकाए रखने पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी जमीन जैसे संवेदनशील मामले में इस तरह की देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। सरकार ने अदालत को बताया कि संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाएंगे। जरूरत पड़ने पर उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर उसे समय-सीमा में पूरा किया जाएगा। जांच में यह भी देखा जाएगा कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही थी या इसके पीछे भू-माफिया से मिलीभगत का कोई मामला है।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि राज्य शासन 5 मार्च को अगली सुनवाई पर विभागीय कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट पेश करे। इस प्रकरण को अब एक नजीर के तौर पर देखा जा रहा है, जहां सिर्फ अतिक्रमण हटाना ही नहीं, बल्कि फाइलों को रोकने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो रही है।





