हिमाचल प्रदेश विधानसभा में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के बजट भाषण के बाद विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने इस बजट को प्रदेश के इतिहास का सबसे ‘निराशाजनक, नीरस और दिशाहीन’ दस्तावेज करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के नाम पर जनता से सुविधाएं छीनने का काम कर रही है।
शनिवार को मीडिया से बात करते हुए जयराम ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस सरकार से प्रदेश की जनता को बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन यह बजट पूरी तरह खोखला साबित हुआ है। उन्होंने कहा कि इसमें न तो भविष्य के लिए कोई विजन है और न ही मौजूदा समस्याओं का कोई समाधान।
’29 साल में ऐसा खोखला बजट नहीं देखा’
अपने राजनीतिक अनुभव का हवाला देते हुए जयराम ठाकुर ने बजट की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि सत्ता में आते ही इस सरकार ने बदले की भावना से काम करना शुरू कर दिया और पूर्व सरकार द्वारा खोले गए 2000 से अधिक संस्थानों को बंद कर दिया, जो सीधे तौर पर जनसुविधा से जुड़े थे।
“मैंने अपने 29 साल के राजनीतिक जीवन में लगातार 29 बजट देखे हैं, लेकिन ऐसा खोखला बजट पहले कभी नहीं देखा। यह सरकार जनहित योजनाओं का बजट और कर्मचारियों का वेतन छीन रही है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” — जयराम ठाकुर, नेता प्रतिपक्ष
ठाकुर ने दावा किया कि सरकार कर्मचारियों को समय पर वेतन तक नहीं दे पा रही है, जो उसकी वित्तीय कुप्रबंधन को दर्शाता है।
केंद्र की योजनाओं पर श्रेय लेने का आरोप
नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री सुक्खू के व्यवहार पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बजट भाषण के दौरान मुख्यमंत्री का अहंकार स्पष्ट दिख रहा था और उन्होंने बजट तैयार करने वाले अधिकारियों की मेहनत को नजरअंदाज कर सारा श्रेय खुद लेने की कोशिश की।
जयराम ठाकुर ने आरोप लगाया, “चाहे सड़क निर्माण हो या नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के कर्मचारियों का मानदेय बढ़ाना, सारा पैसा केंद्र सरकार दे रही है। लेकिन मुख्यमंत्री अपनी कोई नई योजना लाने के बजाय इसे अपनी उपलब्धि बताकर जनता को गुमराह कर रहे हैं।”
उन्होंने सरकार के वादों पर भी निशाना साधा। ठाकुर ने कहा कि 300 यूनिट मुफ्त बिजली का वादा हवा-हवाई हो गया है, बल्कि इसके उलट पानी और बिजली के बढ़े हुए बिलों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार दूध के दाम बढ़ाने का दावा तो कर रही है, लेकिन धरातल पर दूध की सरकारी खरीद लगभग ठप है, जिससे पशुपालकों में भारी गुस्सा है।





